Thursday, 9 November 2023

धनतेरस (धन्वन्तरी ) स्वास्थ्य का पर्व या लक्ष्मी जी का पूजन !! 🙌🙌

 एक गांव में एक अंधा आदमी और उसकी पत्नी रहा करते थे...

अब वो गांव था और लाइट वगैरह की ज्यादा व्यवस्था नहीं थी तो लालटेन की रोशनी में खाना बनाया जाया था.

लेकिन, एक छोटी सी समस्या यह थी कि जब उसकी पत्नी खाना बनाती थी तो खाना बनाते समय हमेशा एक बिल्ली किचेन में घुस आती थी और डिस्टर्ब करती थी...

जिसे बार बार भगाना पड़ता था.

इस समस्या से निपटने के लिए पत्नी ने एक उपाय निकाला कि.... उसने अपने पति को समझाया कि...

चूंकि, अंधा होने की वजह से वो बिल्ली को देख पाने अथवा उसे भगा पाने में असमर्थ है...

इसीलिए, जब वो किचेन में खाना बनाए तो उसका पति हाथ में एक डंडा लेकर किचेन के पास बैठे..

और, वो उस डंडे को जमीन को पटक कर "ठक-ठक" की आवाज निकालते रहे...

जिससे कि बिल्ली किचेन में न आने पाए.

समझाने के बाद उसका पति ऐसा ही करने लगा और उस ठक ठक की आवाज से डर कर बिल्ली का किचेन में आना बंद हो गया.

इस दौरान... घर के जो छोटे बच्चे थे वे बड़े हो गए और नए बच्चों ने भी जन्म लिया.

तो.... घर के बच्चों ने जन्म से ही देखा कि... जब घर में मम्मी खाना बनाती है तो पिता जी किचेन के पास बैठ कर डंडे से "ठक ठक" की आवाज निकालते हैं.

फिर, जब उन बच्चों की भी शादी हुई तो उन्होंने भी इस परंपरा को जारी रखी और जब उनकी पत्नियाँ खाना बनाती थी तो वो किचेन के पास बैठकर किसी डंडे से ठक-ठक की आवाज निकालते थे..!

कालांतर में उनके भी बच्चे हुए और उनमें से कुछ लोग अमेरिका , फ्रांस आदि में जाकर बस गए..

और, व्यस्तता की वजह से खाना बनाते समय उनके लिए किचेन के पास बैठ ठक ठक का आवाज निकालना संभव नहीं रह गया...

इसीलिए, उन्होंने एक ऐसी मशीन बनवा ली जो स्विच ऑन करने पर डंडे से ठक ठक की आवाज निकालते थे...

और, घर में खाना बनते समय वे इस मशीन को ऑन कर दिया करते थे ताकि उनकी पारिवारिक परंपरा कायम रह सके.

कहने का मतलब कि.... एक सामान्य सी घटना अनजाने में ही पारिवारिक परम्परा बन गई...

और, अगर समय रहते इसकी वैज्ञानिकता को समझा गया होता तो शायद ऐसी नौबत नहीं आती...!

कुछ ऐसा ही.... हमारे धनतेरस के साथ है.

आज हम सनातन हिन्दुओं के धनतेरस का त्योहार है.

और, भले ही धनतेरस दीपावली के दो दिन पहले मनाया जाता है...

तथा, धनतेरस के नाम में... "धन" शब्द जुड़ा हुआ है..

लेकिन, धनतेरस का... धन की देवी माँ लक्ष्मी अथवा कुबेर से कोई संबंध नहीं है...!

धनतेरस के नाम में... धन से उतना ही संबंध है...

जितना कि, सोनिया गांधी अथवा राहुल गांधी का महात्मा गांधी से है.

क्योंकि, धनतेरस ... माँ लक्ष्मी की पूजा के लिए नहीं मनाया जाता है..!

बल्कि... धनतेरस का ये महापर्व.... आरोग्य के देवता "धनवंतरी" की याद में मनाया जाता है.



तथा... धनतेरस शब्द में "धन" ... माता लक्ष्मी के कारण नहीं बल्कि... "धनवंतरी" से लिया गया है.

और, चूंकि ये महापर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष के "त्रयोदशी" को मनाया जाता है इसीलिए इसमें "तेरस" शब्द आता है.

ऐसा माना जाता है कि... समुद्र मंथन के दौरान आज के ही दिन आरोग्य के देवता "धनवंतरी" हाथ में अमृत भरे कलश लेकर प्रकट हुए थे.

उन्हीं के याद में आज हम हिन्दू सनातनधर्मी ... धनतेरस का महापर्व मनाते हैं.

और, आज के दिन एक न एक पात्र (बर्तन) खरीदने की परंपरा है...

तथा, वो पात्र इस आस्था और विश्वास के साथ खरीदा जाता है कि... हमारे इस पात्र में भी अमृत की कुछ बूंदे मौजूद रहेंगी..

और, हम तथा हमारे परिवार आरोग्य के देवता भगवान धनवंतरी की कृपा से हमेशा स्वस्थ रहेंगे...

क्योंकि, सनातन हिन्दू संस्कृति में स्वास्थ्य का स्थान हमेशा ही धन से ऊपर माना जाता रहा है.

यह कहावत आज भी प्रचलित है कि 'पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में माया'

इसलिए, दीपावली में सबसे पहले धनतेरस को महत्व दिया जाता है....जो भारतीय संस्कृति के हिसाब से बिल्कुल अनुकूल है.

उसी किचेन के पास बैठ कर डंडे से ठक ठक की आवाज निकालने के तौर पर....आजकल अनजाने में लोग धनतेरस के उपलक्ष्य में.. कार, बाइक्स, स्टील की आलमारी वगैरह बहुतायत में खरीदते हैं...

लेकिन, शास्त्रानुसार... धनतेरस के दिन... लोहे का सामान, स्टील के बर्तन, प्लास्टिक की वस्तुएं एवं कोई धारदार सामान खरीदने से परहेज करना चाहिए.

क्योंकि...लोहे का संबंध शनि ग्रह से माना जाता है

और, स्टील को राहु ग्रह का प्रतीक माना जाता है.

उसी तरह.. प्लास्टिक, चीनी मिट्टी एवं कांच के सामान को भी राहु का प्रतीक मानकर उसे खरीदे जाने से वर्जित किया गया है.

इसके पीछे का वैज्ञानिक कारण ये हो सकता है कि... लोहा, स्टील, प्लास्टिक , चीनी मिट्टी आदि (खासकर इन मेटल्स के बर्तन/प्लेट्स) स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं.

साथ ही धारदार चीज से कोई इंज्युरी हो सकती है.

इसीलिए, इन्हें खरीदने को वर्जित किया गया होगा क्योंकि जब खरीदेंगे नहीं तो ऐसी चीजों का प्रयोग भी नहीं करेंगे और हमारा स्वास्थ्य अच्छा रहेगा.

खैर, आज धनतेरस के दिन... सोना, चांदी, तांबे, कांसे और पीतल के बर्तन खरीदने शुभ माने गए हैं.

और, इसका भी वही कारण मुझे समझ आता है कि... जहाँ सोना और चाँदी हमारे लिए एक रिजर्व धन के रूप में प्रयोग होता है...

वहीं... तांबे, कांसे और पीतल के बर्तन में खाना खाना वैज्ञानिक दृष्टि से स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है.

और, ये तो सामान्य समझ की बात है कि... हम जो बर्तन खरीदेंगे... वही तो प्रयोग करेंगे.

साथ ही साथ आज झाड़ू और भगवान लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा भी खरीदना शुभ माना जाता है.

झाड़ू इसीलिए शुभ माना जाता है क्योंकि... साफ सफाई तो झाड़ू से ही होनी है...

और, झाड़ू /साफ सफाई के बिना तो अच्छे स्वास्थ्य की कल्पना ही नहीं की जा सकती.

वहीं... प्रतिमा खरीदने के पीछे का उद्देश्य ये होगा कि... घर की साफ सफाई धनतेरस से पहले ही पूरी कर लें..

तभी तो खरीदी गई प्रतिमा को उचित स्थान पर रख पाएंगे.

साथ ही... धनतेरस को ही प्रतिमा खरीद लेने से दीपावली के दिन गहमा-गहमी से भी बचा जा सकता है.

खैर... कारण जो हो लेकिन सभी का लक्ष्य एक ही है कि... लोगों को जागरूक करना एवं उन्हें अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रेरित करना...

तथा, वैसे काम/खरीदारी से परहेज करना जिनसे उनके स्वास्थ्य के प्रभावित होने की आशंका हो.

इसीलिए.... परंपरा का पालन अवश्य करना चाहिए लेकिन साथ ही यह भी बेहद जरूरी है कि हम ये जानें कि आखिर ये परम्परा है क्यों और उसका क्या वैज्ञानिक कारण है.

खैर... ज्ञान और वैज्ञानिकता से इतर आज सभी सनातनी हिन्दू मित्रों को हमारे महापर्व धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ...!

भगवान धनवंतरी... आपको एवं आपके परिवार को हमेशा स्वस्थ एवं प्रसन्नचित्त रखें.

श्री संतोष पटेल के सौजन्य से - धर्म का दर्शन पटल पर प्रकाशित 

Sunday, 5 November 2023

क्या आपको ये सच्चा इतिहास पता है l मराठा वीरों का युद्ध कौशल ..

 सन 1680 में औरंगजेब को समझ आ चुका था कि #शिवाजी को रोकने उसे स्वयं ही दक्खन जाना होगा। पांच लाख की विशाल फौज लेकर वह दक्खन की ओर निकला और उसके वहां पहुंचने के पहले ही छत्रपति की मृत्यु हो गई।

औरंगजेब को लगा अब तो मराठों को पराजित करना अत्यंत आसान होगा।

परन्तु छत्रपति सम्भाजी ने 1689 तक उसे जीतने नहीं दिया। अपने सगे साले की दगाबाजी की वजह से छत्रपति सम्भाजी पकड़े गए और औरंगजेब ने अत्यन्त क्रूर और वीभत्स तरीके से उनकी हत्या करवा दी।

अब छत्रपति बने राजाराम मात्र 20 वर्ष के थे और औरंगजेब के अनुभव के सामने कच्चे थे। एकबार फिर उसे दक्खन अपनी मुट्ठी में नज़र आने लगा था।

यहीं से इतिहास यह बताता है कि छत्रपति शिवाजी ने किस आक्रामक संस्कृति की नींव डाली थी। हताश हो कर हथियार डालने के बजाय संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव के नेतृत्व में राजाराम को छत्रपति बना कर संघर्ष जारी रहा।

सन 1700 में छत्रपति राजाराम भी मारे गए।

अब उनके दो साल के पुत्र को छत्रपति मान कर उनकी विधवा ताराबाई, जो कि छत्रपति शिवाजी के सेनापति हंबीराव मोहिते की बेटी थी, आगे आई और प्रखर संघर्ष जारी रहा। समय पड़ने पर ताराबाई स्वयं भी युद्ध के मैदान में उतरी।

संताजी और धनाजी ने मुगल सम्राट की नींद हराम कर दी।

कभी सेना के पिछले हिस्से पर, कभी उनकी रसद पर तो कभी उनके साथ चलने वाले तोपखाने के गोला बारूद पर हमले कर मराठों ने मुगलों को बेजार कर दिया। सब लोग इस खौफ में ही रहते थे कि कब मराठे किस दिशा से आएंगे और कितना नुकसान कर जायेंगे।

एक बार संताजी और उनके दो हजार सैनिकों ने सर्जिकल स्ट्राइक की तर्ज पर रात में औरंगजेब की छावनी पर हमला बोल दिया और औरंगजेब के निजी तंबू की रस्सियां काट दी। तंबू के अंदर के सभी लोग मारे गए। परन्तु संयोग से उस रात औरंगजेब अपने तंबू में नहीं था इसलिए बच गया।

27 साल मुगलों का सम्राट, महाराष्ट्र के जंगलों में छावनियां लगा कर भटकता रहा। रोज यह भय लेकर सोना पड़ता था कि मराठों का आक्रमण न हो जाए।

27 साल कुछ हजार मराठे लाखों मुगलों से लोहा भी ले रहे थे और उन्हें नाकों चने भी चबवा रहे थे। 27 वर्ष सम्राट अपनी राजधानी से दूर था। लाखों रुपए सेना के इस अभियान पर खर्च हो रहे थे। मुगलिया राज दिवालिया हो रहा था। अन्तत: सन 1707 में औरंगजेब की मृत्यु हो गई। 27 वर्षों के सतत युद्ध और संघर्ष के बाद भी मराठों ने घुटने नहीं टेके। छत्रपति के दिए लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हजारों मराठे बलिदान हो गए लेकिन उन्होंने घुटने नही टेके।

यह इतिहास भी कहां पढ़ाया गया है?

कितने लोग है जिन्हें ताराबाई, संताजी और धनाजी के नाम भी मालूम है, पराक्रम तो छोड़ ही दीजिए?