९ अप्रेल २०१३
नशे में धुत, खून के प्यासे AK-47 और RPG से लैस दो हजार से अधिक लड़ाके गांव के भीतर 30 हजार निर्दोष जवान पुरुषों, महिलाओं, बच्चों एवं बुजुर्ग नागरिकों को जिन्हें काट डालने की तैयारी थी. उनके और मौत के बीच खड़ी थी भारतीय सेना की एक छोटी-सी टुकड़ी. क्यूंकि बाकी लोगों के आने का रास्ता विद्रोही लड़ाकों ने बंद कर रखा था.
एक कहानी भारतीय सेना की किसी शोर में नहीं, शौर्य में लिखी गई थी. आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे मलाकाल बैटल, दक्षिण सूडान की कहानी जानकर, जहां 40 भारतीय सैनिक 2 हजार विद्रोही लड़ाकों के सामने दीवार बनकर खड़े थे. जहां दुश्मन नरसंहार के इरादे से आया था और भारतीय सेना ने उसे घुटनों पर ला दिया था.
दक्षिण सूडान का मलाकाल गांव जहां पर संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना ने चारों ओर से घेरा डाल रखा था, पर अचानक से उनके सामने आंतकी संगठन ‘व्हाइट आर्मी’ खड़ी थी. मलाकाल वालों को लगा कि अब सब खत्म हैं. लेकिन वे भूल गए थे कि उनको बचाने उनके गांव के दरवाजे पर कौन खड़ा है? वो भारतीय सेना की टुकड़ी थी. इस ऑपरेशन को तब लीड कर रहे थे 8 राजपूताना राइफल्स के मेजर समर तूर.
जब इतने आक्रामक लड़ाकों को देख कर उस दस्ते के बाकी देशों के शांति सैनिक घबरा गए, तब मेजर तूर ने इसे लीड करने का फैसला लिया. ‘व्हाइट आर्मी’ के विद्रोही लड़ाकों ने रक्षा में खड़ी उस पीसकीपिंग चौकी पर हमला कर दिया, उन्हें लगा वे चौकी को उड़ा देंगे और आसानी से गांव मे घुस जाएंगे. पर 72 घंटे तक भारतीय सैनिकों ने ऐसा जवाब दिया कि उस 2 हजार के झुंड का अहंकार टूट गया.
यह सिर्फ लड़ाई नहीं थी, यह रणनीति की श्रेष्ठता थी. भारतीय सेना के स्नाइपर निशानेबाजों ने 800 मीटर से विद्रोही कमांडरों को ढेर करना शुरू कर दिया और बाहर से भी ट्रूप्स के आने का रास्ता बनाना शुरू किया. गोली और गोला कहां से आ रहे थे, उन लड़ाकों को पता ही नही चल पा रहा था. क्या गजब की स्ट्रेटजी बनाई थी समर तूर ने. उन लड़ाकों की कमान और मनोबल दोनों चकनाचूर हो गए. जब उस हिंसक भीड़ ने भारतीय टुकड़ी के घेरे को तोड़ने की कोशिश की तो BMP-2 बख्तरबंद वाहनों ने पलटवार कर उनका ही रास्ता काट दिया. 2 हजार की संख्या हार गई और 40 लोगों का अनुशासन जीत गया. नतीजा यह हुआ कि ‘व्हाइट आर्मी’ के विद्रोही लड़ाके सिर्फ पीछे ही नहीं हटे, वो हथियार छोड़कर उल्टे पांव भाग खड़े हुए.
मलाकाल बच गया, हजारों जानें बच गईं. इस अद्वितीय साहस और नेतृत्व के लिए मेजर समर तूर को शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया. उन्होंने साबित किया कि भारतीय सैनिक के लिए सीमा कोई मायने नहीं रखती, कर्तव्य ही उसकी पहचान है. पर यह विजय बिना कीमत के नहीं आई. लेफ्टिनेंट कर्नल महिपाल सिंह (9 मैकेनाइज़्ड इन्फैंट्री) जिन्होंने अपने जवानों को बचाने के लिए घात में फंसे बीएमपी के काफिले का नेतृत्व किया था ताकि भारतीय सेना का घेरा ना टुटे. छाती में गोलियां लगीं, फिर भी आखिरी सांस तक जवाबी फायर करते रहे. सूबेदार धर्मेश सांगवान और सूबेदार कुमार पाल सिंह अकोबो में 2 हजार की उग्र भीड़ के सामने खड़े रहे, निर्दोष नागरिकों को सौंपने से इनकार किया और वीरगति को गले लगा लिया. हवलदार हीरा लाल, हवलदार भारत ससमाल, नायब सूबेदार शिव कुमार पाल ये नाम इतिहास नहीं, संस्कार हैं.
जब दुनिया ने सूडान से आंखे फेर ली, तब भारतीय सैनिकों की पीसकीपिंग टुकड़ी ही वह ढाल बनी जो कि मलाकाल के मासूम लोगों के और मौत के बीच खड़ी रही. मलाकाल ने फिर साबित किया कि कारगिल की बर्फ हो या अफ्रीकी सहारा की रेगिस्तानी धूल, भारतीय सेना वहीं खड़ी मिलती है जहां मानवता संकट में होती है. इस युद्ध के बाद मेजर समर तूर ने बंदूक चलाना छोड़ दिया, ताकि अपने साथियों के लिए और बेहतर हथियार बना सकें. उनकी रक्षा कंपनी आज उन्हीं विशेष बलों को सशक्त कर रही है जिनके साथ उन्होंने मोर्चा संभाला था.
यह कहानी इतनी सालिड है कि अब सिनेमा भी इसे छूने आ रहा है. पर फिल्म से पहले, हमें असली नायकों को जानना होगा. मलाकाल कोई कहानी नहीं यह एक सबक है कि जब किसी देश की संस्थाएं डगमगाती हैं, तब बस सैनिक ही खड़ा रहता है शांत, नैतिक और घातक रूप से, दुश्मन की जान लेने के लिए, अपनी जान देने के लिए. मालाकाल में भारतीय सेना चाहती तो पीछे हट सकती थी, ना वो देश अपना था, ना वो लोग. पर तब वो जीत के लिए नहीं, मानवता के लिए लड़े, जो कि भारत देश का स्वभाव है. वो अपनी सेना के नाम पर लड़े, जिसका स्वर्णिम और गौरवशाली इतिहास है. मलाकाल में सभी भारतीय सैनिक बाघों की तरह लड़े.
मलाकाल, संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में भी भारतीय सेना की विरासत का स्वर्णिम अध्याय है. इसे बताया जाना चाहिए, इसे याद रखा जाना चाहिए.
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