Friday, 13 February 2026

भारतीय सेना का अद्भुत पराक्रम , ४० सैनिक २००० पर भारी पड़े .. और मालाकल , सूडान को बचा लिया

 ९ अप्रेल  २०१३ 

नशे में धुत, खून के प्यासे AK-47 और RPG से लैस दो हजार से अधिक लड़ाके गांव के भीतर 30 हजार निर्दोष जवान पुरुषों, महिलाओं, बच्चों एवं बुजुर्ग नागरिकों को जिन्हें काट डालने की तैयारी थी. उनके और मौत के बीच खड़ी थी भारतीय सेना की एक छोटी-सी टुकड़ी. क्यूंकि बाकी लोगों के आने का रास्ता विद्रोही लड़ाकों ने बंद कर रखा था.

एक कहानी भारतीय सेना की किसी शोर में नहीं, शौर्य में लिखी गई थी. आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे मलाकाल बैटल, दक्षिण सूडान की कहानी जानकर, जहां 40 भारतीय सैनिक 2 हजार विद्रोही लड़ाकों के सामने दीवार बनकर खड़े थे. जहां दुश्मन नरसंहार के इरादे से आया था और भारतीय सेना ने उसे घुटनों पर ला दिया था.

दक्षिण सूडान का मलाकाल गांव जहां पर संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना ने‌ चारों ओर से घेरा डाल रखा था, पर अचानक से उनके सामने आंतकी संगठन ‘व्हाइट आर्मी’ खड़ी थी. मलाकाल वालों को लगा कि अब सब खत्म हैं. लेकिन वे भूल गए थे कि उनको बचाने उनके गांव के दरवाजे पर कौन खड़ा है? वो भारतीय सेना की टुकड़ी थी. इस ऑपरेशन को तब लीड कर रहे थे 8 राजपूताना राइफल्स के मेजर समर तूर.

जब इतने आक्रामक लड़ाकों को देख कर उस दस्ते के बाकी देशों के शांति सैनिक घबरा गए, तब मेजर तूर ने इसे लीड करने का फैसला लिया. ‘व्हाइट आर्मी’ के विद्रोही लड़ाकों ने रक्षा में खड़ी उस पीसकीपिंग चौकी पर हमला कर दिया, उन्हें लगा वे चौकी को उड़ा देंगे और आसानी से गांव मे घुस जाएंगे. पर 72 घंटे तक भारतीय सैनिकों ने ऐसा जवाब दिया कि उस 2 हजार के झुंड का अहंकार टूट गया.

यह सिर्फ लड़ाई नहीं थी, यह रणनीति की श्रेष्ठता थी. भारतीय सेना के स्नाइपर निशानेबाजों ने 800 मीटर से विद्रोही कमांडरों को ढेर करना शुरू कर दिया और बाहर से भी ट्रूप्स के आने का रास्ता बनाना शुरू किया. गोली और गोला कहां से आ रहे थे, उन लड़ाकों को पता ही नही चल पा रहा था. क्या गजब की स्ट्रेटजी बनाई थी समर तूर ने. उन लड़ाकों की कमान और मनोबल दोनों चकनाचूर हो गए. जब उस हिंसक भीड़ ने भारतीय टुकड़ी के घेरे को तोड़ने की कोशिश की तो BMP-2 बख्तरबंद वाहनों ने पलटवार कर उनका ही रास्ता काट दिया. 2 हजार की संख्या हार गई‌ और 40 लोगों का अनुशासन जीत गया. नतीजा यह हुआ कि ‘व्हाइट आर्मी’ के विद्रोही लड़ाके सिर्फ पीछे ही नहीं हटे, वो हथियार छोड़कर उल्टे पांव भाग खड़े हुए.

मलाकाल बच गया, हजारों जानें बच गईं. इस अद्वितीय साहस और नेतृत्व के लिए मेजर समर तूर को शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया. उन्होंने साबित किया कि भारतीय सैनिक के लिए सीमा कोई मायने नहीं रखती, कर्तव्य ही उसकी पहचान है. पर यह विजय बिना कीमत के नहीं आई. लेफ्टिनेंट कर्नल महिपाल सिंह (9 मैकेनाइज़्ड इन्फैंट्री) जिन्होंने अपने जवानों को बचाने के लिए घात में फंसे बीएमपी के काफिले का नेतृत्व किया था ताकि भारतीय सेना का घेरा ना टुटे. छाती में गोलियां लगीं, फिर भी आखिरी सांस तक जवाबी फायर करते रहे. सूबेदार धर्मेश सांगवान और सूबेदार कुमार पाल सिंह अकोबो में 2 हजार की उग्र भीड़ के सामने खड़े रहे, निर्दोष नागरिकों को सौंपने से इनकार किया और वीरगति को गले लगा लिया. हवलदार हीरा लाल, हवलदार भारत ससमाल, नायब सूबेदार शिव कुमार पाल ये नाम इतिहास नहीं, संस्कार हैं.

जब दुनिया ने सूडान से आंखे फेर ली, तब भारतीय सैनिकों की पीसकीपिंग टुकड़ी ही वह ढाल बनी जो कि मलाकाल के मासूम लोगों के और मौत के बीच खड़ी रही. मलाकाल ने फिर साबित किया कि कारगिल की बर्फ हो या अफ्रीकी सहारा की रेगिस्तानी धूल, भारतीय सेना वहीं खड़ी मिलती है जहां मानवता संकट में होती है. इस युद्ध के बाद मेजर समर तूर ने बंदूक चलाना छोड़‌ दिया, ताकि अपने साथियों के लिए और बेहतर हथियार बना सकें. उनकी रक्षा कंपनी आज उन्हीं विशेष बलों को सशक्त कर रही है जिनके साथ उन्होंने मोर्चा संभाला था.

यह कहानी इतनी सालिड है कि अब सिनेमा भी इसे छूने आ रहा है. पर फिल्म से पहले, हमें असली नायकों को जानना होगा. मलाकाल कोई कहानी नहीं यह एक सबक है‌ कि जब किसी देश की संस्थाएं डगमगाती हैं, तब बस सैनिक ही खड़ा रहता है शांत, नैतिक और घातक रूप से, दुश्मन की जान लेने के लिए, अपनी जान देने के लिए. मालाकाल में भारतीय सेना चाहती तो पीछे हट सकती थी, ना वो देश अपना था, ना वो लोग. पर तब वो जीत के लिए नहीं, मानवता के लिए लड़े, जो कि भारत देश का स्वभाव है. वो अपनी सेना के नाम पर लड़े, जिसका स्वर्णिम और गौरवशाली इतिहास है. मलाकाल में सभी भारतीय सैनिक बाघों की तरह लड़े.

मलाकाल, संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में भी भारतीय सेना की विरासत का स्वर्णिम अध्याय है. इसे बताया जाना चाहिए, इसे याद रखा जाना चाहिए.

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गुमनामी बाबा , भगवान् जी , स्वामी विजयानंद जी महाराज ( सर्वश्री सुभाष चन्द्र बोस )

 16 सितंबर 1985,

राम भवन, अयोध्या.

शाम के समय 88 वर्ष की परिपक्व आयु का एक संन्यासी अंतिम सांस लेता है। उस समय संन्यासी के इर्द गिर्द उसके कोई चार पांच शिष्य ही थे जोकि अयोध्या/फैज़ाबाद के रसूखदार और प्रसिद्ध लोग थे।

उनमें से एक थे डॉ. आर पी मिश्र, उस समय के अयोध्या के सबसे प्रसिद्ध MS सर्जन जिनसे लोग अपॉइंटमेंट के लिए तरसते थे। एक थे डॉ. टी सी बैनर्जी, जिन्हें 'होम्योपैथ ऑफ द ईस्ट' कहा जाता था। पंडा रामकिशोर भी थे, जो अयोध्या के तीर्थ पुरोहित थे। फैज़ाबाद डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल के डॉ. बी राय, एक प्राध्यापक श्रीवास्तव जी, महात्मा शरण जो फर्नीचर का काम करते थे आदि उपस्थित थे।

ये सभी अपने गुरु को 'भगवनजी' कहकर संबोधित करते थे।

भगवन जी, 1983 में अयोध्या के सिटी मजिस्ट्रेट ठाकुर गुरुदत्त सिंह की कोठी 'राम भवन' में रहने आये थे। भगवन जी की विशेषता यह थी कि उनका चेहरा अमूमन किसी ने नहीं देखा था। वे सार्वजनिक जगहों पर नहीं जाते थे और हमेशा एक मोटे पर्दे के पीछे बैठकर लोगों से बात करते थे।

अस्तु, आज उन भगवन जी की पार्थिव देह भी उसी सीक्रेसी के साथ राम भवन में रखी हुई थी। उनके देहावसान का समाचार कुछ महत्वपूर्ण लोगों को देने के साथ साथ एक संदेश कोलकाता भी भिजवाया गया। कोलकाता इसलिए कि भगवन जी शरीर से बंगाली थे और उनके पूर्वाश्रम के संबंधी कोलकाता में रहते थे।

17 सितंबर को दिनभर प्रतीक्षा करने के बाद शाम को यह तय किया गया कि अगले दिन 18 सितंबर को भगवनजी का अंतिम संस्कार कर दिया जाये।

18 सितंबर 1985 को बड़े ही गुपचुप तरीके से भगवनजी के पार्थिव शरीर को अयोध्या के 'गुप्तार घाट' ले जाया गया। गौरतलब है गुप्तार घाट सरयू नदी का वही घाट है जहाँ त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने जलसमाधि ली थी। यह स्थान आर्मी के कैंट एरिया में आता है और वहां डोगरा रेजिमेंट की छावनी है। इस स्थान पर किसी भी प्रकार के अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं है किन्तु भगवनजी की इच्छानुसार उनका अंतिम संस्कार यहीं होना था।

शीघ्रता से सब बंदोबस्त कर के मात्र 13 लोगों की उपस्थिति में भगवनजी की चिता गुप्तार घाट पर हल्की हल्की रिमिझिम बूंदों के बीच सज गयी।

पंडा रामकिशोर, ने चिता पर भगवनजी की पार्थिव देह को रखा देखकर बड़े मार्मिक स्वर में कहा अब तो भगवनजी के मुखमंडल के अंतिम दर्शन कर निशानी के लिए एक फोटो ही ले लो...! किन्तु डॉ. मिश्र ने रोकते हुए कहा, क्या गुरु आज्ञा का उल्लंघन करोगे? देश में क्या तूफान लाना है। भगवनजी की साधना गुप्त थी। उनकी आज्ञा का सम्मान हो।

संयोग ही था चिता में अग्नि देते ही डोगरा रेजिमेंट की फायरिंग रेंज में फायरिंग प्रैक्टिस शुरू हो गयी। मानों भगवनजी के पूर्ववर्ती जीवन के प्रति सैन्य सम्मान देना प्रकृति ने स्वयं निर्धारित किया हो!

कुछ ही दिनों के भीतर कैंट एरिया के अंदर गुप्तार घाट पर हुये इस गुप्त दाह संस्कार की खबर अयोध्या में आग की तरह फैल गयी। पत्रकारों ने अयोध्या में गुमनाम ज़िंदगी गुजारने वाले भगवनजी को नया नाम दिया, गुमनामी बाबा।

आने वाले महीनों में जब सरकारी हस्तक्षेप के बाद राम भवन में भगवनजी के कमरों को खोला गया तो सब दंग रह गये। उनके कमरों से 28 ट्रंक/ बक्से भरकर समान निकला जिसमें अधिकतर भारत और विश्व के जियोपोलिटिकल स्थिति से संबंधित पुस्तकें थीं। कुछ हस्तनिर्मित नक्शे थे जिनमें 62 की लड़ाई में लखीमपुर के रास्ते चायना पर हमला किया जाए तो कौन सा रूट भारतीय सेना को लेना चाहिए इसकी विस्तृत जानकारी थी। बाद में सैन्य अधिकारियों ने जब नक्शा देखा तो आश्चर्य से कह उठे इस तरह का मिलिट्री स्ट्रेटेजिक मैप तो आर्मी का कोई टॉप कमांडर बन सकता है। टाइम मैगजीन और द स्टेट्समैन न्यूज़पेपर भी सामान में थे।

और थे बक्से भर भर के पत्र चिट्ठियां, जिनमे चौकाने वाली थीं डॉ संपूर्णानंद से लेकर, बाबू बनारसी दास, चौधरी चरण सिंह जैसे उत्तर प्रदेश के पांच पांच मुख्यमंत्रियों को लिखी चिट्ठियां जिनमें भगवनजी इन नेताओं के राजनीति संबंधी प्रश्नों के उत्तर और दिशा निर्देश दे रहे थे।

कुछ चिट्ठी RSS के द्वितीय सरसंघचालक गोलवलकर जी की भी थीं। गोलवलकर जी ने भगवन जी को पूज्यपाद श्रीमान विजयानंद जी महाराज संबोधित कर चरण स्पर्श किया था।

फिर देखने वालों को आश्चर्य हुआ जब भगवनजी के बक्से से नेताजी सुभाषचंद्र बोस के माता पिता की तस्वीर और आजाद हिंद फौज की वर्दी मिली। नेताजी की गोल डायल वाली सोने की रोलेक्स और ओमेगा घड़ियां और गोल फ्रेम के चश्में मिले। जर्मन मेड दूरबीन, इंग्लिश मेड टाइपराइटर, सिगार और पिस्टल मिलीं। कोलकाता से आयीं नेताजी की भतीजी, ललिता बोस ने जब ये सामान और भगवनजी के लिखे पत्र देखे तो देखते ही कह उठीं ये तो उनके सुभाष चाचा की हैंडराइटिंग और सामान हैं।

यह सब सामान अब अयोध्या के 'रामकथा संग्रहालय' में सरकार द्वारा सुरक्षित रखवा दिए गए हैं।

भगवनजी के अंतिम संस्कार के समय उपस्थित लोगों की संख्या मात्र 13 थी। उस समय पंडा रामकिशोर और डॉ. मिश्र, डॉ. बनर्जी आदि ने सजल नेत्रों से कहा...

"जिस व्यक्ति के अंतिम संस्कार में 100 करोड़ से जादा लोग होने चाहिए थे, आज सिर्फ 13 लोग हैं..."