Monday, 23 March 2026

क्या अमेरिका के आम लोग इतने गरीब हैं कि दो वक्त की रोटी जुटा नहीं सकते?

 1. अमेरिका के आम लोग इतने गरीब हैं कि दो वक्त की रोटी जुटा नहीं सकते, 51% अमेरिकी जनता सरकार द्वारा दिये जाने वाले फ़ूड कूपन पर निर्भर है।

2. अमेरिका में खाने पीने की चीज़ों में इतनी मिलावट है कि कैंसर, मुधमेह के मरीज दुनिया मे सबसे अधिक हैं।

3. दुनिया सबसे गन्दा देश अमेरिका है जो दुनिया सबसे अधिक कूड़ा पैदा करता है। अमेरिका ने समुद्र में प्लास्टिक का कूड़ा डाल डाल कर समुद्री जल जीवन का गला घोंट दिया है।

4. अमेरिका में भृष्टाचार के कारण जमीन की महंगाई इतनी है कि केवल 28% लोग ही पत्नी पति के रूप में इक्कठे रहतें हैं।

5. 1960 में अमेरिका की कुल बचत का 80% आम लोगों से आता था। अमेरिकी भृष्ट सरकारों ने अमेरिकी जनता को कर्ज़े के जाल में ऐसा उलझाया कि अब आम लोगों की बचत शून्य % है सब सारी बचत बड़े बड़े चन्द कॉरपोरेट के पास चली गई है। आम लोगों के सिर पर केवल कर्ज़ है।

6. लगभग 24% लोग गरीबी रेखा से नीचे रहतें हैं। लगभग 33% लोगों के पास अपना घर नहीं है।

यह सब तब है जब अमेरिका दुनिया की सारी सम्पत्ति लूट कर अमीर बना हुआ है। वहाँ की धन दौलत कुछ चन्द लोगों तक सीमित है जो कि सेविंग के आंकड़ों से पूरी तरह प्रमाणित हो जाती है। अब कुछ झंडू लोग आकर कहेंगे कि मेरा अमेरिका का वीजा लगवा दो। उनसे मैं कहना चाहूंगा कि आपके वीज़ा लगवा लेनें से सच बदल नहीं जाएगा और यह पूरी जनसंख्या का अध्ययन है आपका अकेले का नहीं। कुछ बेवकूफ भारत की तुलना करने लगेंगे। उनसे मैं कहना चाहूंगा भारत मे गरीबी और भुखमरी का कारण पूंजीवादी और साम्यवाद की घटिया नीतियां हैं। हम अमेरिका बनना चाहते हैं जब उनकी इतनी जनता त्रस्त है तो क्या हमें किसी तीसरे विकल्प का सोचना नहीं चाहिये जिसने भारत को सोने की चिड़िया बना कर रखा था वह भी सन 1700 तक लगातार।

"राष्ट्रहित सर्वोपरि" 💪💪

जय श्री राम 🙏

हर हर महादेव 🔱🙏🚩


Saturday, 21 March 2026

हमारी हार का सबसे बड़ा सबूत- न तो हमें भारत के अधूरे मानचित्र को देखकर दर्द होता है और न ही....

 यहूदी जब बेबीलोन में निर्वासित जीवन जी रहे थे तो वहां की नदियों के तट पर बैठकर येरूशलम की ओर मुंह करके रोते थे और विरह गीत गाते थे ।

उन्होंने वहां सौगंध ले ली कि हम तब तक कोई आनंदोत्सव नहीं मनाएंगे जब तक कि हमें हमारा येरुशलम और जियान पर्वत दोबारा नहीं मिल जाता ।

50 सालों के निर्वासित जीवन में न कोई हर्ष, न गीत, न संगीत और सिर्फ़ अपनी मातृभूमि की वेदना...

इसकी तुलना अपने देश की संततियों से कीजिये ।

जो अफगानिस्तान से निकाले गए, जो पाकिस्तान से निकाले गए, जो बांग्लादेश से निकाले गए, जो कश्मीर से निकाले गए, क्या उनके अंदर अपनी उस भूमि के लिए कोई वेदना है ?

इन निर्वासितों की किसी संस्था को अखंड भारत के लिए कोई कार्यक्रम करते देखा या सुना है ?

अपने छोड़े गए शहर, पहाड़, नदी आदि की स्मृति को क्या उन्होंने किसी रूप में संजोया हुआ है ?

क्या कोई विरह गीत ये अपनी उस खो गई भूमि के लिए गाते हैं ?

क्या अपनी संततियों को समझाते हैं कि उनके दादा-पड़दादा को क्यों, कब और किसने कहाँ से निकाला था ?

मैं ये नहीं कहता कि इनमें से सब ऐसे ही हैं पर जो ऐसे हैं वो बहुसंख्यक में हैं या फिर मान लीजिये कि कल को मैं मेरे जन्मस्थान से खदेड़ दिया गया तो क्या उसकी स्मृति को उसी तरह जी पाऊँगा जैसा बेबीलोन के निर्वासित यहूदी जीते थे...

शायद "नहीं"

एक सभ्यता के रूप में हमारी हार का सबसे बड़ा सबूत यही है कि न तो हमें भारत के अधूरे मानचित्र को देखकर दर्द होता है और न ही हमें हमारी खोई हुई भूमि, नदियां, पर्वत और लूटे धर्मस्थान पीड़ा देते हैं।