Monday, 23 March 2026

क्या अमेरिका के आम लोग इतने गरीब हैं कि दो वक्त की रोटी जुटा नहीं सकते?

 1. अमेरिका के आम लोग इतने गरीब हैं कि दो वक्त की रोटी जुटा नहीं सकते, 51% अमेरिकी जनता सरकार द्वारा दिये जाने वाले फ़ूड कूपन पर निर्भर है।

2. अमेरिका में खाने पीने की चीज़ों में इतनी मिलावट है कि कैंसर, मुधमेह के मरीज दुनिया मे सबसे अधिक हैं।

3. दुनिया सबसे गन्दा देश अमेरिका है जो दुनिया सबसे अधिक कूड़ा पैदा करता है। अमेरिका ने समुद्र में प्लास्टिक का कूड़ा डाल डाल कर समुद्री जल जीवन का गला घोंट दिया है।

4. अमेरिका में भृष्टाचार के कारण जमीन की महंगाई इतनी है कि केवल 28% लोग ही पत्नी पति के रूप में इक्कठे रहतें हैं।

5. 1960 में अमेरिका की कुल बचत का 80% आम लोगों से आता था। अमेरिकी भृष्ट सरकारों ने अमेरिकी जनता को कर्ज़े के जाल में ऐसा उलझाया कि अब आम लोगों की बचत शून्य % है सब सारी बचत बड़े बड़े चन्द कॉरपोरेट के पास चली गई है। आम लोगों के सिर पर केवल कर्ज़ है।

6. लगभग 24% लोग गरीबी रेखा से नीचे रहतें हैं। लगभग 33% लोगों के पास अपना घर नहीं है।

यह सब तब है जब अमेरिका दुनिया की सारी सम्पत्ति लूट कर अमीर बना हुआ है। वहाँ की धन दौलत कुछ चन्द लोगों तक सीमित है जो कि सेविंग के आंकड़ों से पूरी तरह प्रमाणित हो जाती है। अब कुछ झंडू लोग आकर कहेंगे कि मेरा अमेरिका का वीजा लगवा दो। उनसे मैं कहना चाहूंगा कि आपके वीज़ा लगवा लेनें से सच बदल नहीं जाएगा और यह पूरी जनसंख्या का अध्ययन है आपका अकेले का नहीं। कुछ बेवकूफ भारत की तुलना करने लगेंगे। उनसे मैं कहना चाहूंगा भारत मे गरीबी और भुखमरी का कारण पूंजीवादी और साम्यवाद की घटिया नीतियां हैं। हम अमेरिका बनना चाहते हैं जब उनकी इतनी जनता त्रस्त है तो क्या हमें किसी तीसरे विकल्प का सोचना नहीं चाहिये जिसने भारत को सोने की चिड़िया बना कर रखा था वह भी सन 1700 तक लगातार।

"राष्ट्रहित सर्वोपरि" 💪💪

जय श्री राम 🙏

हर हर महादेव 🔱🙏🚩


Saturday, 21 March 2026

हमारी हार का सबसे बड़ा सबूत- न तो हमें भारत के अधूरे मानचित्र को देखकर दर्द होता है और न ही....

 यहूदी जब बेबीलोन में निर्वासित जीवन जी रहे थे तो वहां की नदियों के तट पर बैठकर येरूशलम की ओर मुंह करके रोते थे और विरह गीत गाते थे ।

उन्होंने वहां सौगंध ले ली कि हम तब तक कोई आनंदोत्सव नहीं मनाएंगे जब तक कि हमें हमारा येरुशलम और जियान पर्वत दोबारा नहीं मिल जाता ।

50 सालों के निर्वासित जीवन में न कोई हर्ष, न गीत, न संगीत और सिर्फ़ अपनी मातृभूमि की वेदना...

इसकी तुलना अपने देश की संततियों से कीजिये ।

जो अफगानिस्तान से निकाले गए, जो पाकिस्तान से निकाले गए, जो बांग्लादेश से निकाले गए, जो कश्मीर से निकाले गए, क्या उनके अंदर अपनी उस भूमि के लिए कोई वेदना है ?

इन निर्वासितों की किसी संस्था को अखंड भारत के लिए कोई कार्यक्रम करते देखा या सुना है ?

अपने छोड़े गए शहर, पहाड़, नदी आदि की स्मृति को क्या उन्होंने किसी रूप में संजोया हुआ है ?

क्या कोई विरह गीत ये अपनी उस खो गई भूमि के लिए गाते हैं ?

क्या अपनी संततियों को समझाते हैं कि उनके दादा-पड़दादा को क्यों, कब और किसने कहाँ से निकाला था ?

मैं ये नहीं कहता कि इनमें से सब ऐसे ही हैं पर जो ऐसे हैं वो बहुसंख्यक में हैं या फिर मान लीजिये कि कल को मैं मेरे जन्मस्थान से खदेड़ दिया गया तो क्या उसकी स्मृति को उसी तरह जी पाऊँगा जैसा बेबीलोन के निर्वासित यहूदी जीते थे...

शायद "नहीं"

एक सभ्यता के रूप में हमारी हार का सबसे बड़ा सबूत यही है कि न तो हमें भारत के अधूरे मानचित्र को देखकर दर्द होता है और न ही हमें हमारी खोई हुई भूमि, नदियां, पर्वत और लूटे धर्मस्थान पीड़ा देते हैं।



Friday, 13 February 2026

भारतीय सेना का अद्भुत पराक्रम , ४० सैनिक २००० पर भारी पड़े .. और मालाकल , सूडान को बचा लिया

 ९ अप्रेल  २०१३ 

नशे में धुत, खून के प्यासे AK-47 और RPG से लैस दो हजार से अधिक लड़ाके गांव के भीतर 30 हजार निर्दोष जवान पुरुषों, महिलाओं, बच्चों एवं बुजुर्ग नागरिकों को जिन्हें काट डालने की तैयारी थी. उनके और मौत के बीच खड़ी थी भारतीय सेना की एक छोटी-सी टुकड़ी. क्यूंकि बाकी लोगों के आने का रास्ता विद्रोही लड़ाकों ने बंद कर रखा था.

एक कहानी भारतीय सेना की किसी शोर में नहीं, शौर्य में लिखी गई थी. आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे मलाकाल बैटल, दक्षिण सूडान की कहानी जानकर, जहां 40 भारतीय सैनिक 2 हजार विद्रोही लड़ाकों के सामने दीवार बनकर खड़े थे. जहां दुश्मन नरसंहार के इरादे से आया था और भारतीय सेना ने उसे घुटनों पर ला दिया था.

दक्षिण सूडान का मलाकाल गांव जहां पर संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना ने‌ चारों ओर से घेरा डाल रखा था, पर अचानक से उनके सामने आंतकी संगठन ‘व्हाइट आर्मी’ खड़ी थी. मलाकाल वालों को लगा कि अब सब खत्म हैं. लेकिन वे भूल गए थे कि उनको बचाने उनके गांव के दरवाजे पर कौन खड़ा है? वो भारतीय सेना की टुकड़ी थी. इस ऑपरेशन को तब लीड कर रहे थे 8 राजपूताना राइफल्स के मेजर समर तूर.

जब इतने आक्रामक लड़ाकों को देख कर उस दस्ते के बाकी देशों के शांति सैनिक घबरा गए, तब मेजर तूर ने इसे लीड करने का फैसला लिया. ‘व्हाइट आर्मी’ के विद्रोही लड़ाकों ने रक्षा में खड़ी उस पीसकीपिंग चौकी पर हमला कर दिया, उन्हें लगा वे चौकी को उड़ा देंगे और आसानी से गांव मे घुस जाएंगे. पर 72 घंटे तक भारतीय सैनिकों ने ऐसा जवाब दिया कि उस 2 हजार के झुंड का अहंकार टूट गया.

यह सिर्फ लड़ाई नहीं थी, यह रणनीति की श्रेष्ठता थी. भारतीय सेना के स्नाइपर निशानेबाजों ने 800 मीटर से विद्रोही कमांडरों को ढेर करना शुरू कर दिया और बाहर से भी ट्रूप्स के आने का रास्ता बनाना शुरू किया. गोली और गोला कहां से आ रहे थे, उन लड़ाकों को पता ही नही चल पा रहा था. क्या गजब की स्ट्रेटजी बनाई थी समर तूर ने. उन लड़ाकों की कमान और मनोबल दोनों चकनाचूर हो गए. जब उस हिंसक भीड़ ने भारतीय टुकड़ी के घेरे को तोड़ने की कोशिश की तो BMP-2 बख्तरबंद वाहनों ने पलटवार कर उनका ही रास्ता काट दिया. 2 हजार की संख्या हार गई‌ और 40 लोगों का अनुशासन जीत गया. नतीजा यह हुआ कि ‘व्हाइट आर्मी’ के विद्रोही लड़ाके सिर्फ पीछे ही नहीं हटे, वो हथियार छोड़कर उल्टे पांव भाग खड़े हुए.

मलाकाल बच गया, हजारों जानें बच गईं. इस अद्वितीय साहस और नेतृत्व के लिए मेजर समर तूर को शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया. उन्होंने साबित किया कि भारतीय सैनिक के लिए सीमा कोई मायने नहीं रखती, कर्तव्य ही उसकी पहचान है. पर यह विजय बिना कीमत के नहीं आई. लेफ्टिनेंट कर्नल महिपाल सिंह (9 मैकेनाइज़्ड इन्फैंट्री) जिन्होंने अपने जवानों को बचाने के लिए घात में फंसे बीएमपी के काफिले का नेतृत्व किया था ताकि भारतीय सेना का घेरा ना टुटे. छाती में गोलियां लगीं, फिर भी आखिरी सांस तक जवाबी फायर करते रहे. सूबेदार धर्मेश सांगवान और सूबेदार कुमार पाल सिंह अकोबो में 2 हजार की उग्र भीड़ के सामने खड़े रहे, निर्दोष नागरिकों को सौंपने से इनकार किया और वीरगति को गले लगा लिया. हवलदार हीरा लाल, हवलदार भारत ससमाल, नायब सूबेदार शिव कुमार पाल ये नाम इतिहास नहीं, संस्कार हैं.

जब दुनिया ने सूडान से आंखे फेर ली, तब भारतीय सैनिकों की पीसकीपिंग टुकड़ी ही वह ढाल बनी जो कि मलाकाल के मासूम लोगों के और मौत के बीच खड़ी रही. मलाकाल ने फिर साबित किया कि कारगिल की बर्फ हो या अफ्रीकी सहारा की रेगिस्तानी धूल, भारतीय सेना वहीं खड़ी मिलती है जहां मानवता संकट में होती है. इस युद्ध के बाद मेजर समर तूर ने बंदूक चलाना छोड़‌ दिया, ताकि अपने साथियों के लिए और बेहतर हथियार बना सकें. उनकी रक्षा कंपनी आज उन्हीं विशेष बलों को सशक्त कर रही है जिनके साथ उन्होंने मोर्चा संभाला था.

यह कहानी इतनी सालिड है कि अब सिनेमा भी इसे छूने आ रहा है. पर फिल्म से पहले, हमें असली नायकों को जानना होगा. मलाकाल कोई कहानी नहीं यह एक सबक है‌ कि जब किसी देश की संस्थाएं डगमगाती हैं, तब बस सैनिक ही खड़ा रहता है शांत, नैतिक और घातक रूप से, दुश्मन की जान लेने के लिए, अपनी जान देने के लिए. मालाकाल में भारतीय सेना चाहती तो पीछे हट सकती थी, ना वो देश अपना था, ना वो लोग. पर तब वो जीत के लिए नहीं, मानवता के लिए लड़े, जो कि भारत देश का स्वभाव है. वो अपनी सेना के नाम पर लड़े, जिसका स्वर्णिम और गौरवशाली इतिहास है. मलाकाल में सभी भारतीय सैनिक बाघों की तरह लड़े.

मलाकाल, संयुक्त राष्ट्र शांति सेना में भी भारतीय सेना की विरासत का स्वर्णिम अध्याय है. इसे बताया जाना चाहिए, इसे याद रखा जाना चाहिए.

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गुमनामी बाबा , भगवान् जी , स्वामी विजयानंद जी महाराज ( सर्वश्री सुभाष चन्द्र बोस )

 16 सितंबर 1985,

राम भवन, अयोध्या.

शाम के समय 88 वर्ष की परिपक्व आयु का एक संन्यासी अंतिम सांस लेता है। उस समय संन्यासी के इर्द गिर्द उसके कोई चार पांच शिष्य ही थे जोकि अयोध्या/फैज़ाबाद के रसूखदार और प्रसिद्ध लोग थे।

उनमें से एक थे डॉ. आर पी मिश्र, उस समय के अयोध्या के सबसे प्रसिद्ध MS सर्जन जिनसे लोग अपॉइंटमेंट के लिए तरसते थे। एक थे डॉ. टी सी बैनर्जी, जिन्हें 'होम्योपैथ ऑफ द ईस्ट' कहा जाता था। पंडा रामकिशोर भी थे, जो अयोध्या के तीर्थ पुरोहित थे। फैज़ाबाद डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल के डॉ. बी राय, एक प्राध्यापक श्रीवास्तव जी, महात्मा शरण जो फर्नीचर का काम करते थे आदि उपस्थित थे।

ये सभी अपने गुरु को 'भगवनजी' कहकर संबोधित करते थे।

भगवन जी, 1983 में अयोध्या के सिटी मजिस्ट्रेट ठाकुर गुरुदत्त सिंह की कोठी 'राम भवन' में रहने आये थे। भगवन जी की विशेषता यह थी कि उनका चेहरा अमूमन किसी ने नहीं देखा था। वे सार्वजनिक जगहों पर नहीं जाते थे और हमेशा एक मोटे पर्दे के पीछे बैठकर लोगों से बात करते थे।

अस्तु, आज उन भगवन जी की पार्थिव देह भी उसी सीक्रेसी के साथ राम भवन में रखी हुई थी। उनके देहावसान का समाचार कुछ महत्वपूर्ण लोगों को देने के साथ साथ एक संदेश कोलकाता भी भिजवाया गया। कोलकाता इसलिए कि भगवन जी शरीर से बंगाली थे और उनके पूर्वाश्रम के संबंधी कोलकाता में रहते थे।

17 सितंबर को दिनभर प्रतीक्षा करने के बाद शाम को यह तय किया गया कि अगले दिन 18 सितंबर को भगवनजी का अंतिम संस्कार कर दिया जाये।

18 सितंबर 1985 को बड़े ही गुपचुप तरीके से भगवनजी के पार्थिव शरीर को अयोध्या के 'गुप्तार घाट' ले जाया गया। गौरतलब है गुप्तार घाट सरयू नदी का वही घाट है जहाँ त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने जलसमाधि ली थी। यह स्थान आर्मी के कैंट एरिया में आता है और वहां डोगरा रेजिमेंट की छावनी है। इस स्थान पर किसी भी प्रकार के अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं है किन्तु भगवनजी की इच्छानुसार उनका अंतिम संस्कार यहीं होना था।

शीघ्रता से सब बंदोबस्त कर के मात्र 13 लोगों की उपस्थिति में भगवनजी की चिता गुप्तार घाट पर हल्की हल्की रिमिझिम बूंदों के बीच सज गयी।

पंडा रामकिशोर, ने चिता पर भगवनजी की पार्थिव देह को रखा देखकर बड़े मार्मिक स्वर में कहा अब तो भगवनजी के मुखमंडल के अंतिम दर्शन कर निशानी के लिए एक फोटो ही ले लो...! किन्तु डॉ. मिश्र ने रोकते हुए कहा, क्या गुरु आज्ञा का उल्लंघन करोगे? देश में क्या तूफान लाना है। भगवनजी की साधना गुप्त थी। उनकी आज्ञा का सम्मान हो।

संयोग ही था चिता में अग्नि देते ही डोगरा रेजिमेंट की फायरिंग रेंज में फायरिंग प्रैक्टिस शुरू हो गयी। मानों भगवनजी के पूर्ववर्ती जीवन के प्रति सैन्य सम्मान देना प्रकृति ने स्वयं निर्धारित किया हो!

कुछ ही दिनों के भीतर कैंट एरिया के अंदर गुप्तार घाट पर हुये इस गुप्त दाह संस्कार की खबर अयोध्या में आग की तरह फैल गयी। पत्रकारों ने अयोध्या में गुमनाम ज़िंदगी गुजारने वाले भगवनजी को नया नाम दिया, गुमनामी बाबा।

आने वाले महीनों में जब सरकारी हस्तक्षेप के बाद राम भवन में भगवनजी के कमरों को खोला गया तो सब दंग रह गये। उनके कमरों से 28 ट्रंक/ बक्से भरकर समान निकला जिसमें अधिकतर भारत और विश्व के जियोपोलिटिकल स्थिति से संबंधित पुस्तकें थीं। कुछ हस्तनिर्मित नक्शे थे जिनमें 62 की लड़ाई में लखीमपुर के रास्ते चायना पर हमला किया जाए तो कौन सा रूट भारतीय सेना को लेना चाहिए इसकी विस्तृत जानकारी थी। बाद में सैन्य अधिकारियों ने जब नक्शा देखा तो आश्चर्य से कह उठे इस तरह का मिलिट्री स्ट्रेटेजिक मैप तो आर्मी का कोई टॉप कमांडर बन सकता है। टाइम मैगजीन और द स्टेट्समैन न्यूज़पेपर भी सामान में थे।

और थे बक्से भर भर के पत्र चिट्ठियां, जिनमे चौकाने वाली थीं डॉ संपूर्णानंद से लेकर, बाबू बनारसी दास, चौधरी चरण सिंह जैसे उत्तर प्रदेश के पांच पांच मुख्यमंत्रियों को लिखी चिट्ठियां जिनमें भगवनजी इन नेताओं के राजनीति संबंधी प्रश्नों के उत्तर और दिशा निर्देश दे रहे थे।

कुछ चिट्ठी RSS के द्वितीय सरसंघचालक गोलवलकर जी की भी थीं। गोलवलकर जी ने भगवन जी को पूज्यपाद श्रीमान विजयानंद जी महाराज संबोधित कर चरण स्पर्श किया था।

फिर देखने वालों को आश्चर्य हुआ जब भगवनजी के बक्से से नेताजी सुभाषचंद्र बोस के माता पिता की तस्वीर और आजाद हिंद फौज की वर्दी मिली। नेताजी की गोल डायल वाली सोने की रोलेक्स और ओमेगा घड़ियां और गोल फ्रेम के चश्में मिले। जर्मन मेड दूरबीन, इंग्लिश मेड टाइपराइटर, सिगार और पिस्टल मिलीं। कोलकाता से आयीं नेताजी की भतीजी, ललिता बोस ने जब ये सामान और भगवनजी के लिखे पत्र देखे तो देखते ही कह उठीं ये तो उनके सुभाष चाचा की हैंडराइटिंग और सामान हैं।

यह सब सामान अब अयोध्या के 'रामकथा संग्रहालय' में सरकार द्वारा सुरक्षित रखवा दिए गए हैं।

भगवनजी के अंतिम संस्कार के समय उपस्थित लोगों की संख्या मात्र 13 थी। उस समय पंडा रामकिशोर और डॉ. मिश्र, डॉ. बनर्जी आदि ने सजल नेत्रों से कहा...

"जिस व्यक्ति के अंतिम संस्कार में 100 करोड़ से जादा लोग होने चाहिए थे, आज सिर्फ 13 लोग हैं..."

Friday, 23 January 2026

श्री जतिन चन्द्र दास - अमर वीर बलिदानी - क्रांतिवीर - न झुका न टूटा

 शरीर से मांस का एक-एक कतरा गल चुका था। पसलियां बाहर आ गई थीं। हिलने-डुलने तक की ताकत नहीं बची थी।

जब अंग्रेजों ने देखा कि यह 25 साल का लड़का टूट नहीं रहा, तो उन्होंने जबरदस्ती नाक में नली ठूंसकर दूध पिलाने की कोशिश की। वह नली खाने की नली की जगह फेफड़ों में चली गई।

दूध फेफड़ों में भर गया। वो तड़पते रहे, खून की उल्टियां करते रहे, लेकिन अनशन नहीं तोड़ा।

13 सितंबर 1929 को लाहौर जेल में एक क्रांतिकारी ने अपने प्राण त्याग दिए। 63 दिन... जी हाँ, 63 दिन तक बिना अन्न का एक दाना खाए।

इतिहास के पन्नों में अक्सर हम भगत सिंह की फांसी की बात करते हैं, लेकिन उस साथी को भूल जाते हैं जिसने भगत सिंह की बाहों में दम तोड़ा था।

आज हम बात कर रहे हैं 'यतींद्र नाथ दास' की, जिन्हें दुनिया 'जतिन दा' के नाम से जानती थी।

पेशे से वो बम बनाने में माहिर थे, लेकिन उनका हथियार बना उनका अपना शरीर।

वो चाहते तो माफी मांग सकते थे, खाना खा सकते थे। लेकिन मांग सिर्फ एक थी - "भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ जानवरों जैसा सलूक बंद करो।"

अंग्रेजों को लगा कि भूख इसे तोड़ देगी। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि यह शरीर मिट्टी का नहीं, फौलाद का बना है।

जब जतिन दा की हालत बिगड़ने लगी, तो अंग्रेजों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। जेल के डॉक्टर और सिपाहियों ने उन्हें दबोच लिया। नाक से नली डाली। दर्द से वो चीखते रहे, लेकिन उनका संकल्प नहीं डिगा।

उनकी शहादत की खबर जब बाहर आई, तो पूरा देश रो पड़ा था।

कहा जाता है कि जब उनका शव लाहौर से कलकत्ता ले जाया जा रहा था, तो हर स्टेशन पर हजारों लोग फूल लेकर खड़े थे। कलकत्ता में उनकी अंतिम यात्रा में 6 लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए।

सुभाष चंद्र बोस ने खुद उनके पार्थिव शरीर को कंधा दिया था।

लेकिन आज? आज कितने लोग उस 63 दिन की तपस्या को याद करते हैं?

मरते वक्त जतिन दा ने कहा था, "मैं कोई साधु नहीं हूँ, मैं बस एक साधारण इंसान हूँ जो अपने देश की गरिमा के लिए मरना चाहता है।"

आजादी चरखे से आई या बिना खड्ग-ढाल के, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन यह सच है कि आजादी की नींव में जतिन दा जैसे नौजवानों की गल चुकी हड्डियां गड़ी हैं।

हमें यह आजादी खैरात में नहीं मिली, इसके लिए किसी ने अपनी जवानी के 63 दिन भूखे रहकर कुर्बान किए हैं।

हर भारतीय का कर्तव्य है कि वो जाने कि जिस हवा में वो सांस ले रहा है, उसकी कीमत क्या थी।

इस जानकारी को साझा करें ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि असली 'हीरो' कौन थे।

यह पोस्ट केवल उन भूले-बिसरे नायकों को नमन करने के लिए है।

Thursday, 8 January 2026

इससे बड़ा दानी नहीं कोई

  इससे बड़ा दानी नहीं कोई.

🔴 गत्ते बटोरकर 600 रुपये रोज कमाने वाले इस 'फकीरचंद' के आगे बौने हैं दुनिया के बड़े से बड़े दानवीर...!

● हर रोज जो कमाता हूं उसे बैंक में जमा करा देता हूं. जब ज्यादा पैसे जुड़ जाते हैं तो उन्हें इकट्ठा करके किसी भी सामाजिक संस्था को दान कर देता हूं. मैं अकेला ही हूं. भाई-बहनों की मौत हो चुकी है. शादी नहीं की है.

कैथल,

''नाम फकीरचंद... काम कबाड़ बीनना.. हर रोज की कमाई 600 से 700 रुपये, लेकिन 90 फीसदी कमाई को फकीरचंद दान कर देते हैं. अब तक 35 लाख रुपये का दान कर चुके हैं. खुद शादी नहीं की लेकिन कई लड़कियों की शादी करा चुके हैं जो गरीब परिवार से ताल्लुक रखती थीं. फकीरचंद के चर्चे अब हर जगह हो रहे हैं. लोगों का कहना है कि उनका नाम जरूर फकीरचंद हैं, लेकिन वह दिल से अमीर हैं. ''

दरअसल, कैथल के फकीरचंद अपनी कमाई का 90 प्रतिशत हिस्सा दान में दे देते हैं. शहर के अर्जुन नगर खनौरी रोड बाईपास गली नंबर-1 में रहने वाले फकीरचंद की उम्र 53 साल है. अकेले जीवन बिताने वाले फकीरचंद के घर की बात की जाए तो 200 गज की जमीन पर बने घर में केवल एक कमरा बना हुआ है.

फकीरचंद कीपैड वाला फोन चलाते हैं. कमरे में लोहे का गेट लगा हुआ है. कमरे में कबाड़ रखा रहता है. एक सीलिंग फैन लगा है, पुराना संदूक है, कुछ बर्तन हैं, दीवारों पर कई सारे देवी-देवताओं की तस्वीरें मौजूद हैं.

फकीरचंद कहते हैं कि वे 5 भाई-बहन थे. 4 का देहांत हो चुका है और हम में से किसी की भी शादी नहीं हुई. वह घर में अकेले ही रहते हैं. फकीरचंद कहते हैं कि मरने से पहले इस मकान को भी दान करके जाऊंगा.

*मैं चाहता तो आराम से जिंदगी काट सकता था- फकीरचंद*

फकीरचंद कहते हैं कि भाई-बहनों के गुजर जाने के बाद पारिवारिक जायदाद मुझे ही मिली. मैं चाहता तो जिंदगी भर आराम से बैठकर खा सकता था. सारी सुख-सुविधाओं का आनंद ले सकता था, लेकिन मेरा विश्वास मेहनत करके कमाने-खाने पर है. जब तक मेहनत करता रहूंगा, शरीर भी ठीक रहेगा और शायद इस जन्म में किए गए पुण्य का फल मुझे अगले जन्म में मिले.

कबाड़ और गत्ता बेचते हैं फकीरचंद

बैंक में जमा करता हूं कमाई, फिर दान कर देता हूं - फकीरचंद

फकीरचंद बताते हैं कि वे पिछले 25 साल से कबाड़ बीनने का काम कर रहे हैं. पैदल ही दुकानों से गत्ता खरीदते हैं और फिर उसे कबाड़ी को बेच देता है. इससे 600-700 रुपये की हर रोज कमाई हो जाती है. कमाई की रकम को बैंक अकाउंट में जमा करा देते हैं. जब ज्यादा रकम इकठ्ठा हो जाती है तो उसे विभिन्न सामाजिक संस्थाओं को दान दे देते हैं या फिर सामाजिक कार्यों में लगा देते हैं.

5 लड़कियों की कराई शादी, हर किसी को 75 हजार का सामान

फकीरचंद अब तक गरीब परिवार से आने वालीं 5 लड़कियों की शादी करा चुके हैं. उन्होंने हर एक लड़की को 75 हजार रुपये का सामान भी दिया.

फकीरचंद के दान की लिस्ट

कैथल गोपाल धर्मशाला में गायों के लिए शेड बनवाया, जिस पर 3 लाख रुपए खर्च किए.

नंदीशाला गौशाला में शेड के लिए 4 लाख रुपये का दान.

कैथल की नई अनाज मंडी के नजदीक बनी गौशाला को 4 लाख रुपए का दान.

अरुणाय मंदिर पिहोवा में बनी कैथलवालों की धर्मशाला में भी 1 लाख 70 हजार रुपए की लागत से बनवाया शेड.

निर्माणाधीन नीलकंठ मंदिर में भी फकीरचंद अब तक 12 से 13 लाख रुपए दान दे चुके हैं.

वृद्ध आश्रम कमेटी चौक में 2 लाख 30 हजार रुपये की लागत से कमरा बनवाया.

कैथल में मौजूद खाटू श्याम मंदिर में 3 लाख 60 हजार रुपये से शेड बनवाया.

Tuesday, 6 January 2026

कबूतरों से कई बीमारियां फैल सकती हैं..

 कबूतर पक्षियों का शत्रु  है, कबूतर जहां-जहां जाता है वहां-वहां दूसरे सभी पक्षियों को खत्म कर देता है। पूरे इकोसिस्टम को ध्वस्त कर देता है।

कबूतर एक मात्र ऐसा पक्षी है जिसने खुद को शहरी जीवन के अनुकूल ढाल लिया है। कबूतर ने इंसानों से डरना छोड़ दिया है। कबूतर कहीं भी अंडे दे देता है। कबूतर बड़े पैमाने पर अंडे देता है और धीरे-धीरे अपनी संख्या इतनी बढ़ा लेता है कि दूसरे सभी पक्षी खत्म होने लगते हैं। इकोसिस्टम में कबूतर का शिकार करने वाले पक्षी जैसे बाज और चील बहुत कम हो चुके हैं या ना के बराबर हो गए हैं तो कबूतर अपनी संख्या खूब ज्यादा बढ़ा रहे हैं।

दूसरे सारे पक्षी जहां खुद को शहरी जीवन के अनुकूल नहीं ढाल सके हैं, वहां वे कबूतरों के आतंक और संत्रास की वजह से बेहद कम या विलुप्त होते जा रहे हैं। इतना ही नहीं कबूतरों ने इंसानों और जानवरों में कई खतरनाक बीमारियां फैला दी हैं। अभी गुजरात के सूरत और अहमदाबाद में एक व्यक्ति की मौत हुई और जांच में जब पता चला कि उसकी मौत कबूतर की वजह से हुई है तब सब लोग सकते में आ गए।

कबूतरों से कई बीमारियां फैल सकती हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं: हिस्टोप्लाज्मोसिस, क्रिप्टोकोकोसिस, सिटाकोसिस और हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस। ये बीमारियां कबूतरों की बीट, पंख और धूल के माध्यम से फैल सकती हैं।

हिस्टोप्लाज्मोसिस : यह एक फंगल संक्रमण है जो कि कबूतरों की बीट में पाए जाने वाले फंगस, हिस्टोप्लाज्मा कैप्सुलाटम के कारण होता है। कबूतर का बीट थोड़ी देर अगर कहीं पड़ा रहे तो उसमें खतरनाक फंगस पैदा होने लगते हैं और कई बैक्टीरिया पनपने लगते हैं।

क्रिप्टोकॉकोसिस : यह भी एक फंगल संक्रमण है जो क्रिप्टोकोकस नियोफॉर्मन्स फंगस के कारण होता है, जो कबूतरों की बीट में पाया जाता है।

सिटाकोसिस : इसे ऑर्निथोसिस भी कहा जाता है, यह एक बैक्टीरियल बीमारी है जो क्लैमाइडिया सिटासी बैक्टीरिया के कारण होती है, जो कि कबूतरों में पाई जाती है।‌

हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस : यह एक फेफड़ों की बीमारी है जो कबूतरों के पंखों और बीट से निकलने वाले एलर्जी कारकों के कारण होती है।

वैसे भी कबूतर भारतीय मूल का पक्षी नहीं है, यह अफ्रीका महाद्वीप से भारत में आया और भारत पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया और दूसरे सभी पक्षियों को विलुप्त कर दिया।

जो जैन समुदाय मुंबई में कबूतरों को दाना डालने के लिए वर्षों से आंदोलनरत है उस जैन समुदाय को समझना चाहिए कि कबूतर बढ़ाने से जरूरी है कोयल, गौरैया, मैना, बुलबुल, तोता, कीलहट, टिटिहरी जैसे हजारों भारतीय मूल के पक्षी जो कि शहरों-कस्बों से विलुप्त होते जा रहे हैं उन्हें बचाना ज्यादा जरूरी है। और वह तभी बच सकते हैं जब कबूतरों की संख्या कम की जाए।