कबूतर पक्षियों का शत्रु है, कबूतर जहां-जहां जाता है वहां-वहां दूसरे सभी पक्षियों को खत्म कर देता है। पूरे इकोसिस्टम को ध्वस्त कर देता है।
कबूतर एक मात्र ऐसा पक्षी है जिसने खुद को शहरी जीवन के अनुकूल ढाल लिया है। कबूतर ने इंसानों से डरना छोड़ दिया है। कबूतर कहीं भी अंडे दे देता है। कबूतर बड़े पैमाने पर अंडे देता है और धीरे-धीरे अपनी संख्या इतनी बढ़ा लेता है कि दूसरे सभी पक्षी खत्म होने लगते हैं। इकोसिस्टम में कबूतर का शिकार करने वाले पक्षी जैसे बाज और चील बहुत कम हो चुके हैं या ना के बराबर हो गए हैं तो कबूतर अपनी संख्या खूब ज्यादा बढ़ा रहे हैं।
दूसरे सारे पक्षी जहां खुद को शहरी जीवन के अनुकूल नहीं ढाल सके हैं, वहां वे कबूतरों के आतंक और संत्रास की वजह से बेहद कम या विलुप्त होते जा रहे हैं। इतना ही नहीं कबूतरों ने इंसानों और जानवरों में कई खतरनाक बीमारियां फैला दी हैं। अभी गुजरात के सूरत और अहमदाबाद में एक व्यक्ति की मौत हुई और जांच में जब पता चला कि उसकी मौत कबूतर की वजह से हुई है तब सब लोग सकते में आ गए।
कबूतरों से कई बीमारियां फैल सकती हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं: हिस्टोप्लाज्मोसिस, क्रिप्टोकोकोसिस, सिटाकोसिस और हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस। ये बीमारियां कबूतरों की बीट, पंख और धूल के माध्यम से फैल सकती हैं।
हिस्टोप्लाज्मोसिस : यह एक फंगल संक्रमण है जो कि कबूतरों की बीट में पाए जाने वाले फंगस, हिस्टोप्लाज्मा कैप्सुलाटम के कारण होता है। कबूतर का बीट थोड़ी देर अगर कहीं पड़ा रहे तो उसमें खतरनाक फंगस पैदा होने लगते हैं और कई बैक्टीरिया पनपने लगते हैं।
क्रिप्टोकॉकोसिस : यह भी एक फंगल संक्रमण है जो क्रिप्टोकोकस नियोफॉर्मन्स फंगस के कारण होता है, जो कबूतरों की बीट में पाया जाता है।
सिटाकोसिस : इसे ऑर्निथोसिस भी कहा जाता है, यह एक बैक्टीरियल बीमारी है जो क्लैमाइडिया सिटासी बैक्टीरिया के कारण होती है, जो कि कबूतरों में पाई जाती है।
हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस : यह एक फेफड़ों की बीमारी है जो कबूतरों के पंखों और बीट से निकलने वाले एलर्जी कारकों के कारण होती है।
वैसे भी कबूतर भारतीय मूल का पक्षी नहीं है, यह अफ्रीका महाद्वीप से भारत में आया और भारत पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया और दूसरे सभी पक्षियों को विलुप्त कर दिया।
जो जैन समुदाय मुंबई में कबूतरों को दाना डालने के लिए वर्षों से आंदोलनरत है उस जैन समुदाय को समझना चाहिए कि कबूतर बढ़ाने से जरूरी है कोयल, गौरैया, मैना, बुलबुल, तोता, कीलहट, टिटिहरी जैसे हजारों भारतीय मूल के पक्षी जो कि शहरों-कस्बों से विलुप्त होते जा रहे हैं उन्हें बचाना ज्यादा जरूरी है। और वह तभी बच सकते हैं जब कबूतरों की संख्या कम की जाए।
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