कामदेव भारतीय सनातन संस्कृति में कालांतर में देव के रूप में प्रतिस्थापित हुये।
जन साधारण को गूढ़ अर्थ को समझने में कठिनाई ना हो इसलिए कथानक के रूप में भगवन शिव की कथा में कामदेव को भस्म करने और पुनर्जीवित करने का उल्लेख किया गया।
संसार चालयमान है जीव अर्थात मनुष्य और अन्य चराचरआदि से।
जीव का जन्म होता है और मृत्यु तत्पश्चात पुनः जन्म। . यह चक्र चलायमान है।
यदि मनुष्य और जीवों में अपने जैसे जीवा को देखने और संसार में लेन के आकाँक्षा नहीं होगी तो सृष्टि का चक्र सरक जायेगा.
अतः ईश्वर ने मनुष्य में कामना का भाव दिया। यही भारतीय संस्कृति में पुराणों में कामदेव अर्थात काम के देने वाले के रूप में प्रशंसित हैं।
काम के रूप हैं भोजन की कामना , आवास, वस्त्र, वाहन , शिक्षा, उच्च शिक्षा, अनिवार्यताओं को पूर्ण करने की कामना,, व्याप्पर व्यवसाय , सेवा, अधिकार , सजने संवारने के इच्छा, ऐश्वर्या प्रदर्शन ,विलासिता सभी काम के अधीन है।
ऐसी में विवाह और संतानोत्पत्ति की कामना और इसी का विकृत रूप केवल क्षणिक सुख के लिए अन्य स्त्री पुरुषों से संसर्ग के वासना, और समलैंगिकता, विषम लेंगिकता , बचूं का शोषण। अरब देशों में तो यौवन को बनाये रखने के लिए पुरुषवादी संस्कृति में छोटी बच्चियों से विवाह करने की कुप्रथा को स्थापित किया गया था और अभी भी जारी है।
अस्तु हमारी भारतीय हिन्दू संस्कृति में काम का भी समाय ब्रह्मचर्य के पश्चात अर्थात शिक्षा पूर्ण होने के पश्चात २५ वर्ष की आयु से निर्धारित था।
शिक्षा पूर्ण होने के (समापवर्तन संस्कार Convocation ) पश्चात युवक युवतियां केगुरुजन अपने छात्र छात्राओं का जीवन वृत्त ( curriculum vitae ) अर्थात कुंडली बनाकर अन्य गुरुकुल के छात्र -छात्रोाओ से मिलान करते थे और इस प्रकार चूँकि गुरुजन (गुरु एवं गुरूमाताएँ ) बच्चो को १५ -१८ वर्ष टकटक संपूर्ण संस्कार देते थे , वही गुणों का मिलान किया जाता था और विवाह के प्रस्ताव माता पिता को दे दिए जाते थे।
इस प्रकार मनुष्य पूर्ण युवा और सक्षम हो कर के विवाह और गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था और इसी कारन संतान भी स्वस्थ गुणवान होती थी।
इस प्रकार काम का जीवन में संयमित प्रवेश था।
यही काम अर्थात संतानोत्पत्ति की इच्छा प्रत्येक जीव में होती है।
इसी काम पर विजय पाने वाले शिव होते है।
... और प्रत्येक व्यक्ति शिव हो जाता है जब वह अपनी काम शक्ति और इच्छा को वश में रखता है और
अपने जीवन साथी के साथ ही प्रतिबद्ध रहकर अपने कर्म करता हुआ मोक्ष प्राप्त करता हुआ समय के साथ त्याग देता है।
जो लोग काम को अनुशासित नहीं कर पाते अथवा वासना और मद में आकर मर्यादा से बहार होते है उन्हें समाज और न्यायव्यवस्था दण्डित करती है। अन्यथा काल उन्हें खा ही जाता है।
यही है काम का कामदेव का बहरतीय हिन्दू संस्कृति में महत्व।
कृपया इस उत्तर से प्रसन्न हों और जिज्ञासा हो तो अपवोट करें और प्रश्न करें. .
हमारी संस्कृति के वैज्ञानिक पक्ष को हज़ारों उपवोट देकर विश्वव्यापी बनाएं.
जय हिन्द। जय भारत। जय हिन्दू संस्कृति धर्म।
डॉ विनोद मिश्रा
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