Monday, 28 August 2023

Speed of Light is not measured by Roemer in 1676 but it was described in Rigveda by rishi Sayan before lakhs of year.

 It is not true that the Speed of Light is measured by Danish scientist Olaus Christopher Roemer in 1676. An instrument named a Photometer helps to measure.


बचपन से ही हमें स्कूलों में पढ़ाया गया है कि प्रकाश की गति खोज...... डेनमार्क के खगोलविद ओले क्रिस्टेंसेन रोमर ने की थी.

साथ ही कहा जाता है कि... रोमर से पहले गैलीलियो और न्यूटन जैसे महान वैज्ञानिकों ने काफी प्रयास के बाद भी प्रकाश के वेग को नहीं जान पाए थे.

हालांकि, गैलीलियो इतना तो समझ गए थे कि ब्रह्मांड में प्रकाश की गति सबसे तेज है लेकिन वे ये कभी नहीं जान पाए कि वास्तव में प्रकाश की गति है कितनी ???

अंततः.... रोमर ने पहली बार 1676 में प्रकाश का वेग निर्धारित किया था.

जबकि, वास्तविकता काफी चौंकाने वाली है.

क्योंकि, आधुनिक समय में महर्षि सायण, जो वेदों के महान भाष्यकार थे , ने 14वीं सदी में प्रकाश की गति की गणना कर डाली थी...

जिसका आधार ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 50 वें सूक्त का चौथा श्लोक था.

असल में ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 50 वें सूक्त का चौथा श्लोक कहता है....

तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य ।

विश्वमा भासि रोचनम् ॥

-ऋग्वेद 1. 50 .4  ( TaraNirvishvadarshato jyotishkrdasi surya |                                   vishvamaa bhaasirochanam ||)

अर्थात... हे सूर्य...

तुम तीव्रगामी एवं सर्वसुन्दर तथा प्रकाश के दाता और जगत् को प्रकाशित करने वाले हो. (“Swift and all beautiful art thou, O Surya (Surya=Sun), maker of the light, Illuming all the radiant realm.”)

उपरोक्त श्लोक पर टिप्पणी करते हुए महर्षि सायण ने निम्न श्लोक प्रस्तुत किया था...

तथा च स्मर्यते योजनानां सहस्त्रं द्वे द्वे शते द्वे च योजने एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते॥

-सायण ऋग्वेद भाष्य 1. 50 .4  (tatha ca smaryate yojananam. sahasre dve dve sate dve ca yojane ekena nimishardhena kramaman.) “It is remembered here that Sun (light) traverses 2,202 yojanas in half a nimisha”

अर्थात, आधे निमेष में 2202 योजन का मार्गक्रमण करने वाले प्रकाश तुम्हें नमस्कार है.

इस उपरोक्त श्लोक से हमें प्रकाश के आधे निमिष में 2202 योजन चलने का पता चलता है.

अब हम समय की ईकाई निमिष तथा दूरी की ईकाई योजन को आधुनिक वर्तमान इकाईयों में परिवर्तित कर सकते है.

किन्तु, उससे पूर्व हम प्राचीन समय तथा दूरी की इन इकाईयों के मान को जान लेते हैं.

इस बारे में हमारी मनुस्मृति कहती है...

निमेषे दश चाष्टौ च काष्ठा त्रिंशत्तु ताः कलाः |

त्रिंशत्कला मुहूर्तः स्यात् अहोरात्रं तु तावतः || ........मनुस्मृति 1-64

इस तरह मनुस्मृति 1-64 के अनुसार

पलक झपकने के समय को 1 निमिष कहा जाता है !

18 निमीष = 1 काष्ठ;

30 काष्ठ = 1 कला;

30 कला = 1 मुहूर्त;

30 मुहूर्त = 1 दिन व् रात (लगभग 24 घंटे )

अतः एक दिन (24 घंटे) में निमिष हुए :

24 घंटे = 30x30x30x18= 4,86,000 निमिष

जबकि, आधुनिक गिनती की इकाई के हिसाब से 24 घंटे में सेकेंड हुए ...

24x60x60 = 86,400 सेकंड

इस तरह....

86,400 सेकंड =4,86,000 निमिष

अतः 1 सेकंड में निमिष हुए :

1 निमिष = 86400 /486000 = 0.17778 सेकंड

अंततः.... 1/2 निमिष = 0.17778/2 = 0.08889 सेकंड

Unit of Time: Nimesa

The Moksha dharma parva of Shanti Parva in Mahabharata describes Nimisha as follows:

15 Nimisha = 1 Kastha
30 Kashta = 1 Kala
30.3 Kala = 1 Muhurta
30 Muhurtas = 1 Diva-Ratri (Day-Night)

We know Day-Night is 24 hours

So we get 24 hours = 30 x 30.3 x 30 x 15 nimisha

In other words 409050 nimisha

We know 1 hour = 60 x 60 = 3600 seconds
So 24 hours = 24 x 3600 seconds = 409050 nimisha. 409050 nimesa = 86,400 seconds

1 nimesa = 0.2112 seconds (This is a recursive decimal! Wink of an eye=.2112 seconds!)

1/2 nimesa = 0.1056 seconds

इसी तरह अगर हम योजन की बात करें तो....

श्री मद्भागवतम 3.30.24, 5.1.33, 5.20.43 आदि के अनुसार

1 योजन = 8 मील लगभग

तो, 2202 योजन = 8 x 2202 = 17,616 मील

अब हम अपने ऋग्वेद में उल्लेखित प्रकाश की गति को यदि आधुनिक गणना पद्धति में बिठाते हैं तो... हम पाते हैं कि....

सूर्य प्रकाश 1/2 (आधे) निमिष में 2202 योजन चलता है.... अर्थात,

0.08889 सेकंड में 17, 616 मील चलता है.

अर्थात, 0.08889 सेकंड में प्रकाश की गति = 17,616 मील

तो, 1 सेकेंड में = 17,616 / 0.08889 = 1,98,177 मील (3,18,934.966 किलोमीटर) लगभग

तथा, हैरानी की बात है कि आज की आधुनिकतम विज्ञान भी प्रकाश गति को.... 1,86,000 मील (3,18,934.966 किलोमीटर) प्रति सेकंड ही बताती है. ** english translation below

कहने का मतलब है कि.... खगोल विज्ञान के जिस ज्ञान को आधुनिकतम विज्ञान ने 1676 में खोजा और बताया ...

वो ज्ञान तो हमारे ऋग्वेद में हजारों लाखों साल पहले से ही उल्लेखित है.

इसका मतलब हुआ कि.... जिस समय ये पश्चिमी सभ्यता के लोग जंगलों में नंग धड़ंग रहते थे....

और, चूहे बिल्ली आदि मार कर खाया करते थे....

उस समय हमारे विद्वान ऋषि-मुनि खगोलशास्त्र और विज्ञान में अंतरिक्ष की गहराइयाँ एवं प्रकाश की गति नाप रहे थे...!

क्योंकि, हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ऋग्वेद को निर्विवाद रूप से मानव सभ्यता का सबसे प्राचीन ग्रंथ माना जाता है.

तो, हमारी ऐसी अनमोल उपलब्धियों के कारण हमें अपने धर्मग्रंथों तथा अपने सनातन धर्म पर आखिर क्यों गर्व नहीं होना चाहिए ????

**Unit of Distance: Yojana

Yojana is defined in Chapter 6 of Book 1 of the ancient vedic text “Vishnu Purana” as follows

10 ParamAnus = 1 Parasúkshma
10 Parasúkshmas = 1 Trasarenu
10 Trasarenus = 1 Mahírajas (particle of dust)
10 Mahírajas= 1 Bálágra (hair’s point)
10 Bálágra = 1 Likhsha
10 Likhsha= 1 Yuka
1o Yukas = 1 Yavodara (heart of barley)
10 Yavodaras = 1 Yava (barley grain of middle size)
10 Yava = 1 Angula (1.89 cm or approx 3/4 inch)
6 fingers = 1 Pada (the breadth of it)
2 Padas = 1 Vitasti (span)
2 Vitasti = 1 Hasta (cubit)
4 Hastas = a Dhanu, a Danda, or pauruSa (a man’s height), or 2 Nárikás = 6 feet
2000 Dhanus = 1 Gavyuti (distance to which a cow’s call or lowing can be heard) = 12000 feet
4 Gavyutis = 1 Yojana = 9.09 miles

So now we can calculate the value of the speed of light in modern units based on the value given as 2202 yojanas in 1/2 nimesa

= 2202 x 9.09 miles per 0.1056 seconds

= 20016.18 miles per 0.1056 seconds

= 189547 miles per second !!

As per the modern science speed of light is 186000 miles per second !

Monday, 21 August 2023

संसार के तीन ही रत्न हैं इन्हें सहेजिये, बोइये और बाँटिये

 एक साधु प्रत्येक घर के सामने खड़ा होकर पुकारता।

माई! मुठ्ठी भर मोती देना.. ईश्वर, तुम्हारा कल्याण करेगा.. भला करेगा।'




साधु की यह विचित्र माँग सुनकर स्त्रियाँ चकित हो उठती थीं। वे कहती थीं - 'बाबा! यहाँ तो पेट भरने के लाले पड़े हैं। तुम्हें इतने ढेर सारे मोती कहाँ से दे सकेंगे। आगे बढ़ो...।'

साधु को खाली हाथ, गाँव छोड़ता देख एक बुढ़िया को उस पर दया आई। बुढ़िया ने साधु को पास बुलाया।

उसकी हथेली पर एक नन्हा सा मोती रखकर वह बोली:- साधु महाराज! मेरे पास अंजुलि भर मोती तो नहीं हैं। नाक की नथनी टूटी, तो यह एक मोती मिला है। मैंने इसे संभालकर रखा था। यह मोती ले लो। हमारे गाँव से, खाली हाथ मत जाना।'

बुढ़िया के हाथ का नन्हा सा मोती देखकर साधु हँसने लगा।

उसने कहा, 'माई ! यह छोटा मोती मैं अपनी फटी हुई झोली में कहाँ रखूँ? इसे आप अपने ही पास रखना।'

ऐसा कहकर साधु उस गाँव के बाहर निकल पड़ा। दूसरे गाँव में आकर साधु प्रत्येक घर के सामने खड़ा होकर पुनः पुकारने लगा..!

उस गाँव के एक छोर में किसान का घर था। वहाँ मोती माँगने की चाह उसे घर के सामने ले गई।

भैया ! प्याली भर मोती देना.. ईश्वर, तुम्हारा भला करेगा। साधु ने पुकार लगाई।

किसान बाहर आया। ‍उसने साधु के लिए आंगन में चादर बिछाई और साधु से विनती की,कि....!

साधु महाराज, पधारिए...

किसान ने साधु को प्रणाम किया और मुड़कर पत्नी को आवाज दी..!

लक्ष्मी, बाहर साधु जी आए हैं। इनके दर्शन कर लो। किसान की पत्नी तुरंत बाहर आई। उसने साधुजी के पाँव धोकर दर्शन किए।

किसान ने कहा- 'देख लक्ष्मी; साधुजी बहुत भूखे हैं। इनके भोजन की तुरंत व्यवस्था करना।

अंजुलि भर मोती लेकर पीसना, और उसकी रोटियाँ बनाना। तब तक मैं मोतियों की गागर लेकर आता हूँ।' ऐसा कहकर वह किसान खाली गागर लेकर घर के बाहर निकला।

कुछ समय पश्चात किसान लौट आया। तब तक लक्ष्मी ने भोजन बनाकर तैयार कर रखा था।

साधु ने पेट भर भोजन किया। वह प्रसन्न हुआ। उसने हँसकर किसान से कहा... 'बहुत दिनों बाद कुबेर के घर का भोजन मिला है। मैं बहुत प्रसन्न हूँ।

अब तुम्हारी याद आती रहे, इसलिए मुझे कान भर मोती देना। मैं तुम दंपति को सदैव याद करूँगा।

उस पर किसान ने हँसकर कहा - 'साधु महाराज! मैं अनपढ़ किसान, आपको कान भर मोती कैसे दे सकता हूँ ?

आप ज्ञान संपन्न हैं। इस कारण "हम" दोनों आपसे कान भर मोतियों की अपेक्षा रखते हैं।'

साधु ने आँखें बन्द कर कहा - 'नहीं किसान राजा, तुम अनपढ़ नहीं हो। तुम तो विद्वान हो। इस कारण तुम मेरी इच्छा पूरी करने में सक्षम रहे।

जब तुम जैसा कोई कुबेर भंडारी मिल जाता है तो मै, पेट भरकर भोजन कर लेता हूँ।

साधु ने, किसान की ओर देखा और कहा- "जो फसल के दानों, पानी की बूँदों और उपदेश के शब्दों को मोती समझता है। वही मेरी दृष्टि से सच्चा कुबेर है।

मैं वहाँ पेट भरकर भोजन करता हूँ। फिर वह भोजन दाल-रोटी हो या चटनी रोटी। प्रसन्नता का नमक उसमें स्वाद भर देता है।

किसान दंपत्ति को आशीर्वाद देकर साधु महाराज आगे चल पड़े ।

पृथ्वी पर तीन ही रत्न हैं। जल,अन्न और सुभाषित। मूर्ख लोग ही पत्थर के टुकड़ों हीरे,मोती माणिक्य आदि को रत्न कहते हैं..!!

Sunday, 20 August 2023

राती घाटी का युद्ध - र्बीकानेर के राठौड़ राव जैतसी के मुगलों पर विजय की कथा , राम राम का जय घोष

 "जैसे को तैसा" रणनीति पर लड़ा गया वो युद्ध...

#बाबर 1530 ई में ऊपर जा चुका था... बेटा #हुमायूँ भारत में मुग़ल सल्तनत मजबूत के लिए अफगानों से जूझ रहा था! उधर बाबर का दूसरा बेटा गजनी, लाहौर का शासक कामरान भी #हिंदुस्थान पर गिद्धदृष्टि गढ़ाए हुए था।

उसके हुमायूँ के गिरेबां तक पहुँच बनाने में #राजपुताना के राजपूत सबसे बड़ी बाधा थे, इसलिए कामरान को पहले उनको रास्ते से हटाना जरूरी लगा।

बीकानेर का किला 

तब बीकानेर और आसपास के विशाल जांगल प्रदेश पर प्रबल पराक्रमी राठौड़ राजा #रावजैतसी (१५२६ - १५४२ ) की सत्ता थी...कामरान ने राव जैतसी को संदेश भेजा, "तत्काल हथियार डालो, दस करोड़ रुपए दो और एक राजकन्या भी"...यह सुन जैतसी का खून ख़ौल गया। जैतसी ने भी कामरान के वध और युद्ध की घोषणा करते हुए दूत को खाली हाथ लौटा दिया।

जवाब में बौखलाया कामरान एक हज़ार अमीरों के साथ... बाबर से भी दोगुनी, अत्याधुनिक हथियारों और तोपखाने से सुसज्जित सेना लेकर जांगल प्रदेश पर चढ़ आया! सतुलज पार कर उसने बिजली की गति से भटनेर को घेर लिया...रास्ते में कई कस्बों को रौंदते आई #कामरान की तोपों के आगे भटनेर का किला टिक न सका... गढ़ में जौहर हुआ और पुरुष योद्धा रणभूमि में मारकाट के बाद साका कर बलिदान हो गए।

जीत से उत्साहित कामरान का रक्तपिपासु टिड्डिदल #बीकानेर की ओर बढ़ा...जैतसी ने चतुराई से काम लेते हुए अधिकतर प्रजा को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा दिया और स्वयं भी मुख्य सेना सहित सौभाग्यदीप दुर्ग से गुप्त स्थानों पर चले गए।

कामरान की तोपों का मुंह अब सौभाग्यदीप दुर्ग की ओर था... भीषण युद्ध हुआ, जैतसी के प्रधानमंत्री सद्धहारण समेत सैकड़ों राजपूत काम आए, और इस दुर्ग पर कामरान काबिज होने में सफल रहा।

#इस्लामी लश्कर जल्दी ही रंग दिखाने लगा...हजारों स्त्रियों-बच्चों को बंधक बना लिया गया। उसकी लूट और जुल्मों की दास्तान सुन राव जैतसी ने गुजरात, मुल्तान, मालवा आदि तक के राजाओं को युद्ध मे साथ आने का निमंत्रण भेजा। किसी ने इंकार नहीं किया। सब आ पहुँचे...जैतसी के पास अब सेना की 108 टुकड़ियां और उनके 108 सेनापति थे, पर जैतसी के मस्तिष्क में कुछ ओर ही चल रहा था! उन्हें हर हाल में विजय चाहिए थी, सो कुटिल इस्लामी रणनीति से हमलावरों को सबक सिखाने का निर्णय लिया गया।

जैतसी ने रात्रि युद्ध का विकल्प चुना... हज़ारों पशुओं के सींगों पर और ऊंटों की पीठ पर मशालें व नगाड़े बांध दसों दिशाओं से उन्हें कामरान पर हांक दिया गया। विशेष प्रकार की #व्यूहरचना बना बिजली की गति से अंधेरे में ऐसा भीषण आक्रमण किया गया कि कामरान की सेना भौचक्की रह गई, जलती मशालों, हज़ारों पशुओं और हज़ारों #राजपूतों की हुंकारों से खुद को घिरा देख मुग़लों में भगदड़ मच गई! कामरान का शिरस्त्राण गिर गया, पर भागने की जल्दी में उसने उसे उठाने का प्रयास तक न किया...राजपूत विजयी रहे और कामरान की सेना उल्टे पांव भाग निकली। इतिहासकारों  के अनुसार ये युद्ध २१ घन्टे रात और दिन लगातार चला l 

युद्ध से पहले सभी नगरवासियों को सुरक्षित स्थान पर भेज कर, सौभाग्य दुर्ग में २५०० सैनिकों को रखकर शेष सभी सैनिकों को भी जंगल में सुरक्षा हेतु भेज दिया गया था l 



रोचक बात...२६ अक्टूबर १५३४  को हुए "राती घाटी" के इस युद्ध युद्धघोष "हर हर महादेव" नहीं बल्कि "राम राम" था...और दुर्भाग्य की बात जिस राव जैतसी ने सभी राजाओं को एकजुट किया, मलेच्छों को भगाया... उसी राव जैतसी को अपने पड़ौसी राजा #जोधपुर के राव मालदेव के हाथों कुछ वर्षों बाद १५४१ ई. ( संवत १५९८ वि ) में अपनी जान और राज्य गंवाना पड़ी...

छापा मार पद्धति के इस युद्ध को उस समय का राष्ट्रीय युद्ध भी कहा जाता है l 

साभार - श्री मयूर सुरानी,  'कोरा लेखक ' 

Thursday, 17 August 2023

पौरस ( सम्राट पर्वतेश्वर ) सिकंदर (अलाक्ष्येंद्र ) से पराजित नहीं हुए थे !

 एक सत्य कथा - अविजित महाराज पौरस | 

 


    महाराज पर्वतेश्वर परमानंद जन्म वर्ष और स्थान : सिंध पंजाब क्षेत्र

 राज्याभिषेक: 340 ईसा पूर्व , हत्या की तारीख और स्थान : 316 ईसा-पूर्व, पंजाब क्षेत्र

ने सिकंदर (अलाक्ष्येंद्र Alexander) को घायल कर छोड़ दिया था और कहा था की एक भारतीय सम्राट जैसा व्यवहार  दूसरे सम्राट से करता है वैसा ही हम हारे हुए अलाक्ष्येंद्र के साथ करेंगे l 



वहीँ से घायल सिकंदर को यूनान वापस ले जाया गया  और रास्त में उसकी मृत्यु हो गयी l लेकिन एक आत्ममुग्ध सेना और सेनापति अपने को पराजित कैसे माँ लेते , अतः ये झूठ फैलाया गया कि अल्क्ष्येंद्र की मौत एक जंगली कबीले से लडाई में हुई l 

उस युद्ध का विवरण पढ़िए ...और गर्व कीजिये कि केवल भारतीय सैनिक और राजा ही शत्औरु को क्षमा  करते है और जीवित जाने देते हैं l सिकंदर ने पूरे विश्व में किसी भी राजा को युद्ध के बाद जीवित नहीं छोड़ा था और ना ही  उनके परिवार को , तो फिर , भारत में उसने ऐसा क्यों किया l क्योंकि यहाँ भारत में उसे पहली बार पराजय मिली और घायल होने के बाद उसकी सेना भी भागने लगी इसी दुःख , क्षोभ और ग्लानी में घायल अलक्ष्येंद्र की मृत्यु हो गयी l     

पर्शिया कि हार ने एशिया के द्वार खोल दिया । भागते पर्शियन शासकों का पीछा करते हुये सिकंदर हिंदुकुश तक पहुँच गया । चरवाहों , गुप्तचरों ने सूचना दी इसके पार एक महान सभ्यता है। धन धान्य से भरपूर, सन्यासियों , आचार्यों , गुरूकुलों , योद्धाओं , किसानों से विभूषित सभ्यता जो अभी तक अविजित है।

सिकंदर ने जिसके पास अरबी , फ़रिशर्मिंन घोड़ों से सुसज्जित सेना थी ने भारत पर आक्रमण का आदेश दिया , झेलम के तट पर उसने पड़ाव डाल दिया, आधीनता का आदेश दिया।

महाराज पोरस कि सभा लगी थी, गुप्तचरों ने सूचना दी आधे विश्व को परास्त कर देने वाला यूनान का सम्राट अलक्क्षेन्द्र ने भारत विजय हेतु सीमा पर पड़ाव डाल दिया है।

महामंत्री का प्रस्ताव था - "राजन तक्षशिला के राजा आम्भीक ने अधीनता स्वीकार कर ली है।

यह विश्व विजेता है , भारत के सभी महाजनपदों से वार्ता करके ही कोई उचित निर्णय लें"।

महाराज पोरस जो सात फीट लंबे थे, जिनकी भुजाओं में इतना बल था कि सौ बलशाली योद्धा एक साथ युद्ध करने का साहस नहीं कर सकते थे !

ने महामंत्री को फटकार लगाई "हम भारत के सीमांत क्षेत्र के शासक है यदि हम ही पराजय स्वीकार कर लिये तो भारत कैसे सुरक्षित रहेगा"

अपने पुत्र को सिकंदर कि शक्ति पता करने भेजेते हैं। साहसी पुत्र ने सिकंदर पर हमला कर दिया।

23 वर्ष कि अवस्था में वीर बालक युद्ध भूमि में मारा गया ,

इस समाचार से महाराज पोरस विचलित नहीं हुये उन्होंने सेनापति को झेलम तट पर पड़ाव का आदेश दिया। यूनानी सैनिक इतनी छोटी सेना देखकर हैरान थे ।

21 दिन की प्रतीक्षा के बाद सिंकदर ने पोरस कि सेना पर हमला कर दिया परन्तु अनुपात में कम क्षत्रिय हारने का नाम नहीं ले रहे थे।

सेनापति महाराज पोरस को सूचना देता है "सिकंदर के तेज घोड़ों और बारूद के सामने क्षत्रिय योद्धा वीरगति को प्राप्त कर रहे "

शिवभक्त पोरस महादेव कि आराधना कर रहे थे। पोरस ने दोपहर तक सिकंदर को रोक रखने का आदेश दिया !

दोपहर तक पोरस कि आधी से अधिक सेना खत्म हो चूंकि थी, यूनानी सैनिक जीत के जश्न में डूबने वाले ही थे ! तभी पूर्व से भगवा पताका से आसमान भगवामय हो गया।

हर हर महादेव के शंखनाद से, पृथ्वी कांप उठी झेलम का पानी उफान मारने लगा जैसे अपने राजा का चरण छूने को व्याकुल हो..

10 हजार हाथियों से घिरे महाराज पोरस, ऐसे लग रहे थे कि हाथी के उपर कोई सिंह युद्ध करने को आ रहा है। बची सेना अपने राजा को युद्धस्थल पर देखकर पागल सी हो गई।

सिकंदर अपने अभियान में बहुत से बड़े योद्धाओं को पराजित किया था लेकिन ऐसा दृश्य उसने कभी नहीं देखा था! "क्या कोई व्यक्ति इतना भी विशाल और गर्वित हो सकता है ?"

पोरस के एक संकेत पर हाथियों पर सुसज्जित योद्धा टूट पड़े.. यूनानी सैनिक गाजर-मूली की तरह काट दिये जा रहे थे।हाथियों ने सैनिकों को बुरी तरह कुचल दिया। लेकिन महाराज पोरस की निगाह कुछ और खोज रही थी, उस दुष्ट को जिसने भारत से गद्दारी की थी राजा आम्भीक को जैसे ही वह सामने से निकला पोरस ने बरछी फेंक कर मारी.. लेकिन आम्भीक सिकंदर के सेनापति कि आड़ में छुप गया सेनापति का शरीर छलनी हो गया।

पोरस ने अपने भाले से एक यूनानी के घोड़े पर वार किया उस घोड़े को वहीं ढेर कर दिया। ये सब देखकर सिकंदर समझ गया जब तक पोरस युद्ध भूमि है भारतीय सेना को हराया नहीं जा सकता..।

अभी भी यूनानी सैनिकों की संख्या पोरस के सैनिकों से अधिक थी लेकिन जिस तरह पोरस भीष्म कि तरह काट रहे है.. चारों तरफ भय का वातावरण है।

सिकंदर ने सुनिश्चित किया अब पोरस को ही मारना होगा।

अपने विश्वसनीय घोड़े और 20 योद्धाओं के साथ सिकंदर पोरस कि तरफ बढ़ा।

अपने राजा कि सुरक्षा में भारतीय सैनिकों ने मोर्चा संभाल लिया 20 में से 10 यूनानी योद्धा मार दिये गये लेकिन विश्व विजेता सिकंदर पोरस कि तरफ बढ़ता ही जा रहा था।

अब सिकंदर और पोरस आमने सामने थे। उपर महादेव अपने भक्त कि वीरता देख रहे थे, हाथी के हौदे से एक बिजली चमकी जैसे लगा शिव का त्रिशूल हो ! महाराज पोरस अपने भाले का संधान कर चुकें थे। भाला सिकंदर कि तरफ बढ़ा चला आ रहा था।



घोड़े ने स्वामी भक्ति दिखाई और अगले पैरों को उठाकर वह भाले के सामने आ गया , हवा को चीरता हुआ भाला घोड़े को ढेर कर गया और सिकंदर को जा लगा, घायल - मूर्छित सिकंदर जमीन पर गिर पड़ा, उसने पहली बार खुले में आसमान देखा था

घायल सिकंदर को लेकर उसके योद्धा शिविर की तरफ भागे।

इधर झेलम का उफान थम सा गया, अपने राजा के चरणों को छूकर झेलम थम गई, वापस सामान्य वेग से बहने लगी। आखिर क्यों न उन्हें गर्व हो, आज उनके सम्राट ने विश्व विजेता को पराजित किया है।

कहवत है - जो जीता वही सिकंदर - पर जिसने सिकंदर को जीता वो "महान् सम्राट महाराज पौरस"|

#भारत_माता_की_जय

साभार - श्री मयूर सुरानी , कोरा लेखक 

Sunday, 13 August 2023

चित्तौड़गढ की रानी द्वारा हुमायूं को राखी भेजने की भ्रामक कथा

 राखी का ऐतिहासिक झूठ- सन 1535 दिल्ली का शासक है बाबर का बेटा हुमायूँ

.... उसके सामने देश में दो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं , पहला अफगान शेर खाँ और दूसरा गुजरात का शासक बहादुरशाह .... पर तीन वर्ष पूर्व सन 1532 में चुनार दुर्ग पर घेरा डालने के समय शेर खाँ ने हुमायूँ का अधिपत्य स्वीकार कर लिया है और अपने बेटे को एक सेना के साथ उसकी सेवा में दे चुका है।

  • अफीम का नशेड़ी हुमायूँ शेर खाँ की ओर से निश्चिन्त है , हाँ पश्चिम से बहादुर शाह का बढ़ता दबाव उसे कभी कभी विचलित करता है।
  • हुमायूँ के व्यक्तित्व का सबसे बड़ा दोष है कि वह घोर नशेड़ी है। इसी नशे के कारण ही वह पिछले तीन वर्षों से दिल्ली में ही पड़ा हुआ है, और उधर बहादुर शाह अपनी शक्ति बढ़ाता जा रहा है। वह मालवा को जीत चुका है और मेवाड़ भी उसके अधीन है। पर अब दरबारी अमीर, सामन्त और उलेमा हुमायूँ को चैन से बैठने नहीं दे रहे। बहादुर शाह की बढ़ती शक्ति से सब भयभीत हैं। आखिर हुमायूँ उठता है और मालवा की ओर बढ़ता है।
  • इस समय बहादुरशाह चित्तौड़ दुर्ग पर घेरा डाले हुए है। चित्तौड़ में किशोर राणा विक्रमादित्य के नाम पर राजमाता कर्णावती शासन कर रहीं हैं। उनके लिए यह विकट घड़ी है। सात वर्ष पूर्व खानवा के युद्ध मे महाराणा सांगा के साथ अनेक योद्धा सरदार वीरगति प्राप्त कर चुके हैं। रानी के पास कुछ है, तो विक्रमादित्य और उदयसिंह के रुप में दो अबोध बालक, और एक राजपूतनी का अदम्य साहस। सैन्य बल में चित्तौड़ बहादुर शाह के समक्ष खड़ा भी नहीं हो सकता, पर साहसी राजपूतों ने बहादुर शाह के समक्ष शीश झुकाने से इनकार कर दिया है।

इधर बहादुर शाह से उलझने को निकला हुमायूँ अब चित्तौड़ की ओर मुड़ गया है। अभी वह सारंगपुर में है तभी उसे बहादुर शाह का सन्देश मिलता है जिसमें उसने लिखा है, "चित्तौड़ के विरुद्ध मेरा यह अभियान विशुद्ध जेहाद है। जबतक मैं काफिरों के विरुद्ध जेहाद पर हूँ तबतक मुझपर हमला गैर-इस्लामि है। अतः हुमायूँ को चाहिए कि वह अपना अभियान रोक दे।”

….हुमायूँ का बहादुर शाह से कितना भी बैर हो पर दोनों का मजहब एक है, सो हुमायूँ ने बहादुर शाह के जेहाद का समर्थन किया है। अब वह सारंगपुर में ही डेरा जमा के बैठ गया है, आगे नहीं बढ़ रहा।

  • इधर चित्तौड़ राजमाता ने कुछ राजपूत नरेशों से सहायता मांगी है। पड़ोसी राजपूत नरेश सहायता के लिए आगे आये हैं, पर वे जानते हैं कि बहादुरशाह को हराना अब सम्भव नहीं। पराजय निश्चित है सो सबसे आवश्यक है चित्तौड़ के भविष्य को सुरक्षित करना। और इसी लिए रात के अंधेरे में बालक युवराज उदयसिंह को पन्ना धाय के साथ गुप्त मार्ग से निकाल कर बूंदी पहुँचा दिया जाता है।

अब राजपूतों के पास एकमात्र विकल्प है वह युद्ध, जो पूरे विश्व में केवल वही करते हैं। शाका और जौहर…..

  1. आठ मार्च 1535, राजपूतों ने अपना अद्भुत जौहर दिखाने की ठान ली है। सूर्योदय के साथ किले का द्वार खुलता है। पूरी राजपूत सेना माथे पर केसरिया पगड़ी बांधे निकली है। आज सूर्य भी रुक कर उनका शौर्य देखना चाहता है, आज हवाएं उन अतुल्य स्वाभिमानी योद्धाओं के चरण छूना चाहती हैं, आज धरा अपने वीर पुत्रों को कलेजे से लिपटा लेना चाहती है, आज इतिहास स्वयं पर गर्व करना चाहता है, आज भारत स्वयं के भारत होने पर गर्व करना चाहता है।




इधर मृत्यु का आलिंगन करने निकले वीर राजपूत बहादुरशाह की सेना पर विद्युतगति से तलवार भाँज रहे हैं, और उधर किले के अंदर महारानी कर्णावती के पीछे असंख्य देवियाँ मुह में गंगाजल और तुलसी पत्र लिए अग्निकुंड में समा रही हैं। यह जौहर है। वह जौहर जो केवल राजपूत देवियाँ जानती हैं। वह जौहर जिसके कारण भारत अब भी भारत है।

  • किले के बाहर गर्म रक्त की गंध फैल गयी है, और किले के अंदर अग्नि में समाहित होती क्षत्राणियों की देहों की....!

पूरा वायुमंडल महक उठा है और घृणा से नाक सिकोड़ कर खड़ी प्रकृति जैसे चीख कर कह रही है- “भारत की आने वाली पीढ़ियों! इस दिन को याद रखना, और याद रखना इस गन्ध को। जीवित जलती अपनी माताओं के देह की गंध जबतक तुम्हें याद रहेगी, तुम्हारी सभ्यता जियेगी। जिस दिन यह गन्ध भूल जाओगे तुम्हें फारस होने में दस वर्ष भी नहीं लगेंगे…”

  • दो घण्टे तक चले युद्ध में स्वयं से चार गुने शत्रुओं को मार कर राजपूतों ने वीरगति पा ली है, और अंदर किले में असंख्य देवियों ने अपनी राख से भारत के मस्तक पर स्वाभिमान का टीका लगाया है। युद्ध समाप्त हो चुका। राजपूतों ने अपनी सभ्यता दिखा दी, अब बहादुरशाह अपनी सभ्यता दिखायेगा।

अगले तीन दिन तक बहादुर शाह की सेना चित्तौड़ दुर्ग को लुटती रही। किले के अंदर असैनिक कार्य करने वाले लुहार, कुम्हार, पशुपालक, व्यवसायी इत्यादि पकड़ पकड़ कर काटे गए। उनकी स्त्रियों को लूटा गया। उनके बच्चों को भाले की नोक पर टांग कर खेल खेला गया। चित्तौड़ को तहस नहस कर दिया गया।

……और उधर सारंगपुर में बैठा बाबर का बेटा हुमायूँ इस जेहाद को चुपचाप देखता रहा, खुश होता रहा।

युग बीत गए पर भारत की धरती राजमाता कर्णावती के जलते शरीर की गंध नहीं भूली। फिर कुछ गद्दारों ने इस गन्ध को भुलाने के लिए कथा गढ़ी- “राजमाता कर्णावती ने हुमायूँ के पास राखी भेज कर सहायता मांगी थी।”

अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए मुँह में तुलसी दल ले कर अग्निकुंड में उतर जाने वाली देवियाँ अपने पति के हत्यारे के बेटे से सहायता नहीं मांगती पार्थ! राखी की इस झूठी कथा के षड्यंत्र में कभी मत फंसना।।

ये लेख अखिलेश दुबे (तनहा ) के सौजन्य से , कोरा पर प्रकाशित है l 

कृपया वीर रानी कर्णावती के बलिदान को नमन करें l 

ध्यान दें की जो राजा हुमायूं  उस विचारधारा का है जहां सभी स्त्रियाँ भोग् की वास्तु मानी गयी हैं l और  काफ़िर को , हर हाल में कुचलना सिखाया गया है , वो कैसे रक्षा बंधन को स्वीकार कर सकता  है .

अगर राखी भेजी होती तो बलिदान क्यों दिया , और जिस व्यक्ति ने रानी के पति को चल से मारा उसे रानी क्यों कर सहायता मांगेंगी l 

कृपया इस सत्य  कथा को  लोगों तक पहुंचाएं l