"जैसे को तैसा" रणनीति पर लड़ा गया वो युद्ध...
#बाबर 1530 ई में ऊपर जा चुका था... बेटा #हुमायूँ भारत में मुग़ल सल्तनत मजबूत के लिए अफगानों से जूझ रहा था! उधर बाबर का दूसरा बेटा गजनी, लाहौर का शासक कामरान भी #हिंदुस्थान पर गिद्धदृष्टि गढ़ाए हुए था।
उसके हुमायूँ के गिरेबां तक पहुँच बनाने में #राजपुताना के राजपूत सबसे बड़ी बाधा थे, इसलिए कामरान को पहले उनको रास्ते से हटाना जरूरी लगा।
बीकानेर का किला
तब बीकानेर और आसपास के विशाल जांगल प्रदेश पर प्रबल पराक्रमी राठौड़ राजा #रावजैतसी (१५२६ - १५४२ ) की सत्ता थी...कामरान ने राव जैतसी को संदेश भेजा, "तत्काल हथियार डालो, दस करोड़ रुपए दो और एक राजकन्या भी"...यह सुन जैतसी का खून ख़ौल गया। जैतसी ने भी कामरान के वध और युद्ध की घोषणा करते हुए दूत को खाली हाथ लौटा दिया।
जवाब में बौखलाया कामरान एक हज़ार अमीरों के साथ... बाबर से भी दोगुनी, अत्याधुनिक हथियारों और तोपखाने से सुसज्जित सेना लेकर जांगल प्रदेश पर चढ़ आया! सतुलज पार कर उसने बिजली की गति से भटनेर को घेर लिया...रास्ते में कई कस्बों को रौंदते आई #कामरान की तोपों के आगे भटनेर का किला टिक न सका... गढ़ में जौहर हुआ और पुरुष योद्धा रणभूमि में मारकाट के बाद साका कर बलिदान हो गए।
जीत से उत्साहित कामरान का रक्तपिपासु टिड्डिदल #बीकानेर की ओर बढ़ा...जैतसी ने चतुराई से काम लेते हुए अधिकतर प्रजा को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा दिया और स्वयं भी मुख्य सेना सहित सौभाग्यदीप दुर्ग से गुप्त स्थानों पर चले गए।
कामरान की तोपों का मुंह अब सौभाग्यदीप दुर्ग की ओर था... भीषण युद्ध हुआ, जैतसी के प्रधानमंत्री सद्धहारण समेत सैकड़ों राजपूत काम आए, और इस दुर्ग पर कामरान काबिज होने में सफल रहा।
#इस्लामी लश्कर जल्दी ही रंग दिखाने लगा...हजारों स्त्रियों-बच्चों को बंधक बना लिया गया। उसकी लूट और जुल्मों की दास्तान सुन राव जैतसी ने गुजरात, मुल्तान, मालवा आदि तक के राजाओं को युद्ध मे साथ आने का निमंत्रण भेजा। किसी ने इंकार नहीं किया। सब आ पहुँचे...जैतसी के पास अब सेना की 108 टुकड़ियां और उनके 108 सेनापति थे, पर जैतसी के मस्तिष्क में कुछ ओर ही चल रहा था! उन्हें हर हाल में विजय चाहिए थी, सो कुटिल इस्लामी रणनीति से हमलावरों को सबक सिखाने का निर्णय लिया गया।
जैतसी ने रात्रि युद्ध का विकल्प चुना... हज़ारों पशुओं के सींगों पर और ऊंटों की पीठ पर मशालें व नगाड़े बांध दसों दिशाओं से उन्हें कामरान पर हांक दिया गया। विशेष प्रकार की #व्यूहरचना बना बिजली की गति से अंधेरे में ऐसा भीषण आक्रमण किया गया कि कामरान की सेना भौचक्की रह गई, जलती मशालों, हज़ारों पशुओं और हज़ारों #राजपूतों की हुंकारों से खुद को घिरा देख मुग़लों में भगदड़ मच गई! कामरान का शिरस्त्राण गिर गया, पर भागने की जल्दी में उसने उसे उठाने का प्रयास तक न किया...राजपूत विजयी रहे और कामरान की सेना उल्टे पांव भाग निकली। इतिहासकारों के अनुसार ये युद्ध २१ घन्टे रात और दिन लगातार चला l
युद्ध से पहले सभी नगरवासियों को सुरक्षित स्थान पर भेज कर, सौभाग्य दुर्ग में २५०० सैनिकों को रखकर शेष सभी सैनिकों को भी जंगल में सुरक्षा हेतु भेज दिया गया था l
रोचक बात...२६ अक्टूबर १५३४ को हुए "राती घाटी" के इस युद्ध युद्धघोष "हर हर महादेव" नहीं बल्कि "राम राम" था...और दुर्भाग्य की बात जिस राव जैतसी ने सभी राजाओं को एकजुट किया, मलेच्छों को भगाया... उसी राव जैतसी को अपने पड़ौसी राजा #जोधपुर के राव मालदेव के हाथों कुछ वर्षों बाद १५४१ ई. ( संवत १५९८ वि ) में अपनी जान और राज्य गंवाना पड़ी...
छापा मार पद्धति के इस युद्ध को उस समय का राष्ट्रीय युद्ध भी कहा जाता है l
साभार - श्री मयूर सुरानी, 'कोरा लेखक '
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