Tuesday, 26 March 2024

श्रृंगबेरपुर Shrangberpur , near Prayagraj Astonishing Science of Water purification 2500 years old

 

श्री संजय चौहान , कओरा लेखक का लेख , साभार l  

प्रयागराज के पास एक जगह है श्रृंगबेरपुर, 

भगवान राम गंगा पार करने के लिए यहां आए थे।

ऐसा वर्णन मिलता है कि यहां के तालाब में इतना शुद्ध जल था कि उन्होंने इसका जल पिया।

ठीक उसी जगह एक भव्य निर्माण मिला है जिसमें हाइड्रोलिक इंजिनियरिंग तकनीक का प्रयोग हुआ है जिसका काल लगभग दो से ढाई हजार साल पूर्व का  है।

नदियों के आस पास आई बाढ़ को लेकर प्राचीन भारत के वैज्ञानिकों द्वारा जो इंजिनियरिंग की गई है, वह असाधारण है।

प्राप्त संरचना में तीन अंतःस्राव-सह-भंडारण टैंक बने हुए मिले हैं,जो 11 मीटर चौड़ी और 5 मीटर गहरी नहर से जोड़े गए हैं।

इस नहर के माध्यम से गंगा से बाढ़ के पानी को निकाला जाता था। नहर का पानी सबसे पहले एक बड़े कक्ष में प्रवेश करता था जहाँ गाद इकट्ठा हो जाती थी और पानी मिट्टी से अलग हो जाता था।

इस अपेक्षाकृत साफ पानी को पहले ईंट-लाइन वाले पहले टैंक में भेजा जाता था,फिर एक सीढ़ीदार इनलेट के माध्यम से दूसरे टैंक में भेजने की व्यवस्था की गई थी जो पानी को और साफ कर देता था।

यह टैंक क्षेत्र में जल आपूर्ति का प्राथमिक स्रोत था। इसके बाद,पानी एक तीसरे गोलाकार टैंक तक जाता था, जिसमें एक विस्तृत सीढ़ी थी।

एक बड़ा बांध जहां अपशिष्ट पदार्थ रुक जाता था जिसमें सात स्पिल चैनल,एक शिखर और एक अंतिम निकास शामिल था, निर्मित मिला जिससे अतिरिक्त पानी वापस गंगा में बहा दिया जाता था।

पानी के नियमन की इतनी बेहतरीन व्यवस्था धौलावीरा में भी देखने को मिलती है।

रुद्रदामन का गिरनार अभिलेख सुदर्शन झील की मरम्मत की सूचना देता है जो लगभग बाइस से वर्ष पूर्व की बात है।

जल नियामक तकनीक का विकास एकाएक नही हो गया होगा।

बाकायदा इसके लिए प्रशिक्षण शिक्षण की कोई न कोई संस्था रही होगी जहां

इसके बारे में सिखाया पढ़ाया जाता होगा।

वर्तमान में जल संयत्र श्रृंगबेरपुर के मुकाबले बड़े ही दोयम दर्जे के हैं।

पानी को साफ नही कर पाते और बाढ़ के समय या मानसूनी वर्षा के अधिक होने के कारण जलभराव चारों ओर

दिखता है।

सामूहिक चेतना का उच्च होना और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति कृतज्ञ भाव अतीत से वर्तमान को पृथक करता है शायद।

लेख अच्छा लगे तो साझा कीजिएगा।



Monday, 25 March 2024

गणेश शंकर विद्यार्थी 25 March Balidaan Diwas

 



आज गणेश शंकर विद्यार्थी जी का पुण्यतिथि है गणेश शंकर विद्यार्थी जीवन पंथी विचारधारा के थे और मुसलमानों को अपना भाई मानते थे अपने अखबार दैनिक प्रताप में भी वह अक्सर हिंदू मुस्लिम भाईचारा की बातें लिखते थे

भगत सिंह की फांसी के अगले दिन कानपुर में सार्वजनिक हड़ताल का आयोजन किया गया था।

लेकिन मुसलमानों ने अपनी दुकाने बंद करने से इंकार कर दिया।

जिसके बाद पूरे शहर में दंगा भड़क गया था।

इस दंगे के दौरान गणेश शंकर विद्यार्थी मुस्लिम इलाकों में घूम कर मुसलमानो की जान बचाते रहे एक बुजुर्ग मुसलमान जिसकी उन्होंने जान बचाई उसने उनके हाथ भी चूमे

फिर उन्हें जब सूचना मिली कि एक मुस्लिम मोहल्ले में कुछ हिंदू बंधक है तो गणेश शंकर विद्यार्थी जो पूरी जिंदगी मुसलमान को अपना हमदर्द समझते रहे वह जब मुस्लिम इलाके में गए तब उनका ब्रह्म इस कत्ल कर दिया गया और उनकी लाश फेंक दी गई

दो दिन के बाद 25 मार्च 1931 को उनकी छत विछत लाश मिली

और इसी दंगे के दौरान 25 मार्च 1931 को महान पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी को मुस्लिम दंगाईयों की भीड़ ने बड़ी बेरहमी से कत्ल कर डाला था।

हर छोटी-बड़ी मॉबलिंचिंग पर छाती पीटने वाले लिबरल-लुटियन पत्रकार इस शहादत पर चुप क्यों हो जाते हैं। वो क्यों नहीं बताते कि विद्यार्थी मुस्लिम मॉबलिंचिंग के शिकार थे।

आज #गणेश_शंकर_विद्यार्थी की पुण्यतिथि है। सादर श्रद्धांजलि।

Monday, 4 March 2024

हलाल डॉक्टर Medical Practitioner, निश्चित मृत्यु

 कभी मिले हो इनसे ...!!!!! दिल्ली , उत्तर प्रदेश, बिहार और मेदान्ता मेडिकल सिटी  में भी मिल जायेंगे .

गली गली मे डाॅक्टर और डेंटल सर्जन बैठे है। हर मेडिकल स्टोर के अंदर बने केबिन मे एक डाॅक्टर साहब विराजमान मिलेंगें। MBBS ड्रिग्री धारी...

कभी गुडगाँव मे "मेदांता द मेडिसिटी" हो आईये, बाकायदा हिजाबधारी लडकियां और दाढीयुक्त मोमिन डाॅक्टर मिलेंगें।

कभी मूड हो तो थोडी पडताल कर लेना, सब के सब बांग्लादेश जाकर डाॅक्टरी पढे है, बचे खुचे वुहान (चीन) या फिर यूक्रेन, और रशियन फेडरेशन के देशो के मेडिकल काॅलेजो से।

कशमीरियो मे तो एक परम्परा ही बन गई है, "हलाल डिग्री" लेने की, जो केवल बांग्लादेश मे मिलती है। ये हलाल डिग्री वाले डाॅक्टर इतने एक्सपर्ट डाॅक्टर है कि बगैर MCI का एग्जाम पास किये, प्रैक्टिस करते है, कशमीर है भाई, जहाँ इंडिया के नाम से ही चिढ हो, तो मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया गई तेल लेने, भारत सरकार तक चूँ ना करे।

बेखौफ, बेलौस प्रेक्टिस करते है "बांग्लादेश" से हलाल डिग्री लेकर आये डाॅक्टर साहब। राज्य सरकार भी सबसे ज्यादा वरीयता बांग्लादेश से डिग्री लेकर लौटे दढियलो को ही देती है।

और काबिलियत तो पूछिये ही मत, जम्मू परिक्षेत्र है, तो दस्त की दवाई लेने 300 किलोमीटर दूर जम्मू भागिये, कशमीर रीजन है तो चलिये शेर ए कशमीर श्रीनगर।

एक दाँत तक निकलवाना तो जम्मू जाईये, जबकि एक एक ड्रिस्ट्रिक्ट हाॅस्पिटल के पे रोल पर पचास पचास डाॅक्टर मौजूद है।

यही हाल यूक्रेन, रोमानिया, बुल्गारिया, रूस, के डिग्रीधारियो का है। कमाल तो ये है कि वहाँ मेडिकल की पढाई स्थानीय भाषा मे होती है, ना कि अंग्रेजी मे। सीधे M.D. की डिग्री मिलती है, जो यहाँ एग्जाम पास करने के बाद MBBS के समकक्ष मानी जाती है, और इसे लेने मे मात्र 07 साल लगते है। पहला साल केवल लैंग्वेज सिखाई जाती है, क्योंकि मेडिसिन की पढाई का माध्यम केवल और केवल स्थानीय भाषा है।

अरे मेडिकल तो छोडिये, फाईटर एयरक्राफ्ट / पनडुब्बी के क्रू, नेवल नेविगेशन और एडमिरल गोर्शकोव (विक्रमादित्य) की ट्रेनिंग रूस मे पाने वाले सैनिको से पूछकर देखिये, वही बता देंगें कि उनको ट्रैनिंग किस भाषा मे दी जाती है.

शायद वो वर्ष था, 1984 जब हमारे स्कवाड्रन लीडर राकेश शर्मा जी को पहले काॅस्मोनाॅट बनने का गौरव प्राप्त हुआ था, जो USSR के बैकानूर (वर्तंमान मे कजाकिस्तान) से अंतरिक्ष मे गये थे रूसियो के साथ। कभी पता करिये कि उन्होने रूसी भाषा क्यों सीखी थी? ट्रेनिंग का माध्यम कौन सी भाषा थी?

चलिये फिर से डाॅक्टरो की काबिलियत पर आते है। तो जनाब इन डाॅक्टर साहब ने डिग्री प्राप्त कर ली, MCI का छोटा सा दफ्तर है, सेक्टर -8 द्वारका दिल्ली मे मलेरिया इंस्टीट्यूट के बगल मे। मेडिकल काउंसिल का एग्जाम पास किया या नही किया कौन पूछने आता है इनसे? किसी भी बी-ग्रेड सिटी मे नर्सिंग होम खोलकर बैठ गये। कौन सा मरीज इलाज से पहले डाॅक्टर की ड्रिगी चैक कर रहा है?

इलाके के थानेदार को क्या पडी है, कि वो डाॅक्टर से मगजमारी करता फिरे। हो गये डाॅगदर, चल पडी डाॅगदरी। दस दिन ICU का बिल बनाओ, और रेफर कर दो, ....किसी को फर्क नही पडता, ना डाॅगदर को, ना मरीज के तीमारदारो को। इंसानी जिंदगी बहुत सस्ती है ना अपने देश में।

जरा सोचिये, साल दर साल तीस हजार डाॅक्टर तो अकेले यूक्रेन से आ रहे है, दस बीस हजार बांग्लादेश से, उतने ही चीन, रोमानिया, बुल्गारिया, हंगरी, कजाकिस्तान, ताजिकिस्तान, मालदोवा, उजबेकिस्तान जैसे देशो से आ रहे है। फिर हम ये भी बोलते है कि डाॅक्टर कसांई है, ऐसे लूट लिया, ऐसे काट लिया, ऐसे मेडिकल नेग्लीजेंसी के चलते मरीज मर गया।

हरियाणा जैसे राज्यो मे तो जमींदारो मे मशहूर कहावते जन्म ले चुकी है...

ये दो किल्ले, रामप्यारी के ब्याह मे बेच देंगें, दो किल्ले बेच के रामकिशन को यूक्रेन/रूस से MBBS करवाणी है, अर फेर ये पाँच किल्ले बेच के इसका नर्सिंग होम बण ज्यागा।

मै दस फैमिलीज को जानता हूँ, जो अपनी SUV लेकर, सपरिवार छोरी को मेडिकल ऐट्रेंस एग्जाम दिलवाने हरियाणा से बैंगलोर, चेन्नई, गुवाहाटी तक गये है। चल्लो छोरी पेपर दे लेगी, अर हम घूम यांगे।

और बाद मे यही भारत जैसा देश मेडिकल प्रैक्टिस मे डाॅक्टरो से नेकनीयती, शुचिता, ईमानदारी, सच्चाई की उम्मीद भी करता है।

भाई ठगी, चालाकी, बेईमानी, जोड तोड, और मक्कारी से नाममात्र के डाॅक्टर बनने वाले वही सब तरीके तो अपनायेंगें ना?

काबिल होते तो यही डाॅक्टर बन लेते, एग्जाम पास कर लेते। किसी लायक नही थे, तभी तो जोड तोड, पैसे, संपर्को, दौड, और येन केण प्रकारेण डाॅक्टर बनने डोनेशन सीट पर बांग्लादेश, चीन, यूक्रेन, रोमानिया, कजाकिस्तान, ताजिकिस्तान से डाॅक्टर बनकर आये है।

अब सोच लो भाई, क्योंकि जान है तुम्हारी, पैसा है तुम्हारा, बीमारी है तुम्हारी। और डाॅक्टर है यूक्रेन /बांग्लादेश का।