कभी मिले हो इनसे ...!!!!! दिल्ली , उत्तर प्रदेश, बिहार और मेदान्ता मेडिकल सिटी में भी मिल जायेंगे .
गली गली मे डाॅक्टर और डेंटल सर्जन बैठे है। हर मेडिकल स्टोर के अंदर बने केबिन मे एक डाॅक्टर साहब विराजमान मिलेंगें। MBBS ड्रिग्री धारी...
कभी गुडगाँव मे "मेदांता द मेडिसिटी" हो आईये, बाकायदा हिजाबधारी लडकियां और दाढीयुक्त मोमिन डाॅक्टर मिलेंगें।
कभी मूड हो तो थोडी पडताल कर लेना, सब के सब बांग्लादेश जाकर डाॅक्टरी पढे है, बचे खुचे वुहान (चीन) या फिर यूक्रेन, और रशियन फेडरेशन के देशो के मेडिकल काॅलेजो से।
कशमीरियो मे तो एक परम्परा ही बन गई है, "हलाल डिग्री" लेने की, जो केवल बांग्लादेश मे मिलती है। ये हलाल डिग्री वाले डाॅक्टर इतने एक्सपर्ट डाॅक्टर है कि बगैर MCI का एग्जाम पास किये, प्रैक्टिस करते है, कशमीर है भाई, जहाँ इंडिया के नाम से ही चिढ हो, तो मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया गई तेल लेने, भारत सरकार तक चूँ ना करे।
बेखौफ, बेलौस प्रेक्टिस करते है "बांग्लादेश" से हलाल डिग्री लेकर आये डाॅक्टर साहब। राज्य सरकार भी सबसे ज्यादा वरीयता बांग्लादेश से डिग्री लेकर लौटे दढियलो को ही देती है।
और काबिलियत तो पूछिये ही मत, जम्मू परिक्षेत्र है, तो दस्त की दवाई लेने 300 किलोमीटर दूर जम्मू भागिये, कशमीर रीजन है तो चलिये शेर ए कशमीर श्रीनगर।
एक दाँत तक निकलवाना तो जम्मू जाईये, जबकि एक एक ड्रिस्ट्रिक्ट हाॅस्पिटल के पे रोल पर पचास पचास डाॅक्टर मौजूद है।
यही हाल यूक्रेन, रोमानिया, बुल्गारिया, रूस, के डिग्रीधारियो का है। कमाल तो ये है कि वहाँ मेडिकल की पढाई स्थानीय भाषा मे होती है, ना कि अंग्रेजी मे। सीधे M.D. की डिग्री मिलती है, जो यहाँ एग्जाम पास करने के बाद MBBS के समकक्ष मानी जाती है, और इसे लेने मे मात्र 07 साल लगते है। पहला साल केवल लैंग्वेज सिखाई जाती है, क्योंकि मेडिसिन की पढाई का माध्यम केवल और केवल स्थानीय भाषा है।
अरे मेडिकल तो छोडिये, फाईटर एयरक्राफ्ट / पनडुब्बी के क्रू, नेवल नेविगेशन और एडमिरल गोर्शकोव (विक्रमादित्य) की ट्रेनिंग रूस मे पाने वाले सैनिको से पूछकर देखिये, वही बता देंगें कि उनको ट्रैनिंग किस भाषा मे दी जाती है.
शायद वो वर्ष था, 1984 जब हमारे स्कवाड्रन लीडर राकेश शर्मा जी को पहले काॅस्मोनाॅट बनने का गौरव प्राप्त हुआ था, जो USSR के बैकानूर (वर्तंमान मे कजाकिस्तान) से अंतरिक्ष मे गये थे रूसियो के साथ। कभी पता करिये कि उन्होने रूसी भाषा क्यों सीखी थी? ट्रेनिंग का माध्यम कौन सी भाषा थी?
चलिये फिर से डाॅक्टरो की काबिलियत पर आते है। तो जनाब इन डाॅक्टर साहब ने डिग्री प्राप्त कर ली, MCI का छोटा सा दफ्तर है, सेक्टर -8 द्वारका दिल्ली मे मलेरिया इंस्टीट्यूट के बगल मे। मेडिकल काउंसिल का एग्जाम पास किया या नही किया कौन पूछने आता है इनसे? किसी भी बी-ग्रेड सिटी मे नर्सिंग होम खोलकर बैठ गये। कौन सा मरीज इलाज से पहले डाॅक्टर की ड्रिगी चैक कर रहा है?
इलाके के थानेदार को क्या पडी है, कि वो डाॅक्टर से मगजमारी करता फिरे। हो गये डाॅगदर, चल पडी डाॅगदरी। दस दिन ICU का बिल बनाओ, और रेफर कर दो, ....किसी को फर्क नही पडता, ना डाॅगदर को, ना मरीज के तीमारदारो को। इंसानी जिंदगी बहुत सस्ती है ना अपने देश में।
जरा सोचिये, साल दर साल तीस हजार डाॅक्टर तो अकेले यूक्रेन से आ रहे है, दस बीस हजार बांग्लादेश से, उतने ही चीन, रोमानिया, बुल्गारिया, हंगरी, कजाकिस्तान, ताजिकिस्तान, मालदोवा, उजबेकिस्तान जैसे देशो से आ रहे है। फिर हम ये भी बोलते है कि डाॅक्टर कसांई है, ऐसे लूट लिया, ऐसे काट लिया, ऐसे मेडिकल नेग्लीजेंसी के चलते मरीज मर गया।
हरियाणा जैसे राज्यो मे तो जमींदारो मे मशहूर कहावते जन्म ले चुकी है...
ये दो किल्ले, रामप्यारी के ब्याह मे बेच देंगें, दो किल्ले बेच के रामकिशन को यूक्रेन/रूस से MBBS करवाणी है, अर फेर ये पाँच किल्ले बेच के इसका नर्सिंग होम बण ज्यागा।
मै दस फैमिलीज को जानता हूँ, जो अपनी SUV लेकर, सपरिवार छोरी को मेडिकल ऐट्रेंस एग्जाम दिलवाने हरियाणा से बैंगलोर, चेन्नई, गुवाहाटी तक गये है। चल्लो छोरी पेपर दे लेगी, अर हम घूम यांगे।
और बाद मे यही भारत जैसा देश मेडिकल प्रैक्टिस मे डाॅक्टरो से नेकनीयती, शुचिता, ईमानदारी, सच्चाई की उम्मीद भी करता है।
भाई ठगी, चालाकी, बेईमानी, जोड तोड, और मक्कारी से नाममात्र के डाॅक्टर बनने वाले वही सब तरीके तो अपनायेंगें ना?
काबिल होते तो यही डाॅक्टर बन लेते, एग्जाम पास कर लेते। किसी लायक नही थे, तभी तो जोड तोड, पैसे, संपर्को, दौड, और येन केण प्रकारेण डाॅक्टर बनने डोनेशन सीट पर बांग्लादेश, चीन, यूक्रेन, रोमानिया, कजाकिस्तान, ताजिकिस्तान से डाॅक्टर बनकर आये है।
अब सोच लो भाई, क्योंकि जान है तुम्हारी, पैसा है तुम्हारा, बीमारी है तुम्हारी। और डाॅक्टर है यूक्रेन /बांग्लादेश का।