Friday, 23 January 2026

श्री जतिन चन्द्र दास - अमर वीर बलिदानी - क्रांतिवीर - न झुका न टूटा

 शरीर से मांस का एक-एक कतरा गल चुका था। पसलियां बाहर आ गई थीं। हिलने-डुलने तक की ताकत नहीं बची थी।

जब अंग्रेजों ने देखा कि यह 25 साल का लड़का टूट नहीं रहा, तो उन्होंने जबरदस्ती नाक में नली ठूंसकर दूध पिलाने की कोशिश की। वह नली खाने की नली की जगह फेफड़ों में चली गई।

दूध फेफड़ों में भर गया। वो तड़पते रहे, खून की उल्टियां करते रहे, लेकिन अनशन नहीं तोड़ा।

13 सितंबर 1929 को लाहौर जेल में एक क्रांतिकारी ने अपने प्राण त्याग दिए। 63 दिन... जी हाँ, 63 दिन तक बिना अन्न का एक दाना खाए।

इतिहास के पन्नों में अक्सर हम भगत सिंह की फांसी की बात करते हैं, लेकिन उस साथी को भूल जाते हैं जिसने भगत सिंह की बाहों में दम तोड़ा था।

आज हम बात कर रहे हैं 'यतींद्र नाथ दास' की, जिन्हें दुनिया 'जतिन दा' के नाम से जानती थी।

पेशे से वो बम बनाने में माहिर थे, लेकिन उनका हथियार बना उनका अपना शरीर।

वो चाहते तो माफी मांग सकते थे, खाना खा सकते थे। लेकिन मांग सिर्फ एक थी - "भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ जानवरों जैसा सलूक बंद करो।"

अंग्रेजों को लगा कि भूख इसे तोड़ देगी। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि यह शरीर मिट्टी का नहीं, फौलाद का बना है।

जब जतिन दा की हालत बिगड़ने लगी, तो अंग्रेजों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। जेल के डॉक्टर और सिपाहियों ने उन्हें दबोच लिया। नाक से नली डाली। दर्द से वो चीखते रहे, लेकिन उनका संकल्प नहीं डिगा।

उनकी शहादत की खबर जब बाहर आई, तो पूरा देश रो पड़ा था।

कहा जाता है कि जब उनका शव लाहौर से कलकत्ता ले जाया जा रहा था, तो हर स्टेशन पर हजारों लोग फूल लेकर खड़े थे। कलकत्ता में उनकी अंतिम यात्रा में 6 लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए।

सुभाष चंद्र बोस ने खुद उनके पार्थिव शरीर को कंधा दिया था।

लेकिन आज? आज कितने लोग उस 63 दिन की तपस्या को याद करते हैं?

मरते वक्त जतिन दा ने कहा था, "मैं कोई साधु नहीं हूँ, मैं बस एक साधारण इंसान हूँ जो अपने देश की गरिमा के लिए मरना चाहता है।"

आजादी चरखे से आई या बिना खड्ग-ढाल के, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन यह सच है कि आजादी की नींव में जतिन दा जैसे नौजवानों की गल चुकी हड्डियां गड़ी हैं।

हमें यह आजादी खैरात में नहीं मिली, इसके लिए किसी ने अपनी जवानी के 63 दिन भूखे रहकर कुर्बान किए हैं।

हर भारतीय का कर्तव्य है कि वो जाने कि जिस हवा में वो सांस ले रहा है, उसकी कीमत क्या थी।

इस जानकारी को साझा करें ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि असली 'हीरो' कौन थे।

यह पोस्ट केवल उन भूले-बिसरे नायकों को नमन करने के लिए है।

Thursday, 8 January 2026

इससे बड़ा दानी नहीं कोई

  इससे बड़ा दानी नहीं कोई.

🔴 गत्ते बटोरकर 600 रुपये रोज कमाने वाले इस 'फकीरचंद' के आगे बौने हैं दुनिया के बड़े से बड़े दानवीर...!

● हर रोज जो कमाता हूं उसे बैंक में जमा करा देता हूं. जब ज्यादा पैसे जुड़ जाते हैं तो उन्हें इकट्ठा करके किसी भी सामाजिक संस्था को दान कर देता हूं. मैं अकेला ही हूं. भाई-बहनों की मौत हो चुकी है. शादी नहीं की है.

कैथल,

''नाम फकीरचंद... काम कबाड़ बीनना.. हर रोज की कमाई 600 से 700 रुपये, लेकिन 90 फीसदी कमाई को फकीरचंद दान कर देते हैं. अब तक 35 लाख रुपये का दान कर चुके हैं. खुद शादी नहीं की लेकिन कई लड़कियों की शादी करा चुके हैं जो गरीब परिवार से ताल्लुक रखती थीं. फकीरचंद के चर्चे अब हर जगह हो रहे हैं. लोगों का कहना है कि उनका नाम जरूर फकीरचंद हैं, लेकिन वह दिल से अमीर हैं. ''

दरअसल, कैथल के फकीरचंद अपनी कमाई का 90 प्रतिशत हिस्सा दान में दे देते हैं. शहर के अर्जुन नगर खनौरी रोड बाईपास गली नंबर-1 में रहने वाले फकीरचंद की उम्र 53 साल है. अकेले जीवन बिताने वाले फकीरचंद के घर की बात की जाए तो 200 गज की जमीन पर बने घर में केवल एक कमरा बना हुआ है.

फकीरचंद कीपैड वाला फोन चलाते हैं. कमरे में लोहे का गेट लगा हुआ है. कमरे में कबाड़ रखा रहता है. एक सीलिंग फैन लगा है, पुराना संदूक है, कुछ बर्तन हैं, दीवारों पर कई सारे देवी-देवताओं की तस्वीरें मौजूद हैं.

फकीरचंद कहते हैं कि वे 5 भाई-बहन थे. 4 का देहांत हो चुका है और हम में से किसी की भी शादी नहीं हुई. वह घर में अकेले ही रहते हैं. फकीरचंद कहते हैं कि मरने से पहले इस मकान को भी दान करके जाऊंगा.

*मैं चाहता तो आराम से जिंदगी काट सकता था- फकीरचंद*

फकीरचंद कहते हैं कि भाई-बहनों के गुजर जाने के बाद पारिवारिक जायदाद मुझे ही मिली. मैं चाहता तो जिंदगी भर आराम से बैठकर खा सकता था. सारी सुख-सुविधाओं का आनंद ले सकता था, लेकिन मेरा विश्वास मेहनत करके कमाने-खाने पर है. जब तक मेहनत करता रहूंगा, शरीर भी ठीक रहेगा और शायद इस जन्म में किए गए पुण्य का फल मुझे अगले जन्म में मिले.

कबाड़ और गत्ता बेचते हैं फकीरचंद

बैंक में जमा करता हूं कमाई, फिर दान कर देता हूं - फकीरचंद

फकीरचंद बताते हैं कि वे पिछले 25 साल से कबाड़ बीनने का काम कर रहे हैं. पैदल ही दुकानों से गत्ता खरीदते हैं और फिर उसे कबाड़ी को बेच देता है. इससे 600-700 रुपये की हर रोज कमाई हो जाती है. कमाई की रकम को बैंक अकाउंट में जमा करा देते हैं. जब ज्यादा रकम इकठ्ठा हो जाती है तो उसे विभिन्न सामाजिक संस्थाओं को दान दे देते हैं या फिर सामाजिक कार्यों में लगा देते हैं.

5 लड़कियों की कराई शादी, हर किसी को 75 हजार का सामान

फकीरचंद अब तक गरीब परिवार से आने वालीं 5 लड़कियों की शादी करा चुके हैं. उन्होंने हर एक लड़की को 75 हजार रुपये का सामान भी दिया.

फकीरचंद के दान की लिस्ट

कैथल गोपाल धर्मशाला में गायों के लिए शेड बनवाया, जिस पर 3 लाख रुपए खर्च किए.

नंदीशाला गौशाला में शेड के लिए 4 लाख रुपये का दान.

कैथल की नई अनाज मंडी के नजदीक बनी गौशाला को 4 लाख रुपए का दान.

अरुणाय मंदिर पिहोवा में बनी कैथलवालों की धर्मशाला में भी 1 लाख 70 हजार रुपए की लागत से बनवाया शेड.

निर्माणाधीन नीलकंठ मंदिर में भी फकीरचंद अब तक 12 से 13 लाख रुपए दान दे चुके हैं.

वृद्ध आश्रम कमेटी चौक में 2 लाख 30 हजार रुपये की लागत से कमरा बनवाया.

कैथल में मौजूद खाटू श्याम मंदिर में 3 लाख 60 हजार रुपये से शेड बनवाया.

Tuesday, 6 January 2026

कबूतरों से कई बीमारियां फैल सकती हैं..

 कबूतर पक्षियों का शत्रु  है, कबूतर जहां-जहां जाता है वहां-वहां दूसरे सभी पक्षियों को खत्म कर देता है। पूरे इकोसिस्टम को ध्वस्त कर देता है।

कबूतर एक मात्र ऐसा पक्षी है जिसने खुद को शहरी जीवन के अनुकूल ढाल लिया है। कबूतर ने इंसानों से डरना छोड़ दिया है। कबूतर कहीं भी अंडे दे देता है। कबूतर बड़े पैमाने पर अंडे देता है और धीरे-धीरे अपनी संख्या इतनी बढ़ा लेता है कि दूसरे सभी पक्षी खत्म होने लगते हैं। इकोसिस्टम में कबूतर का शिकार करने वाले पक्षी जैसे बाज और चील बहुत कम हो चुके हैं या ना के बराबर हो गए हैं तो कबूतर अपनी संख्या खूब ज्यादा बढ़ा रहे हैं।

दूसरे सारे पक्षी जहां खुद को शहरी जीवन के अनुकूल नहीं ढाल सके हैं, वहां वे कबूतरों के आतंक और संत्रास की वजह से बेहद कम या विलुप्त होते जा रहे हैं। इतना ही नहीं कबूतरों ने इंसानों और जानवरों में कई खतरनाक बीमारियां फैला दी हैं। अभी गुजरात के सूरत और अहमदाबाद में एक व्यक्ति की मौत हुई और जांच में जब पता चला कि उसकी मौत कबूतर की वजह से हुई है तब सब लोग सकते में आ गए।

कबूतरों से कई बीमारियां फैल सकती हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं: हिस्टोप्लाज्मोसिस, क्रिप्टोकोकोसिस, सिटाकोसिस और हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस। ये बीमारियां कबूतरों की बीट, पंख और धूल के माध्यम से फैल सकती हैं।

हिस्टोप्लाज्मोसिस : यह एक फंगल संक्रमण है जो कि कबूतरों की बीट में पाए जाने वाले फंगस, हिस्टोप्लाज्मा कैप्सुलाटम के कारण होता है। कबूतर का बीट थोड़ी देर अगर कहीं पड़ा रहे तो उसमें खतरनाक फंगस पैदा होने लगते हैं और कई बैक्टीरिया पनपने लगते हैं।

क्रिप्टोकॉकोसिस : यह भी एक फंगल संक्रमण है जो क्रिप्टोकोकस नियोफॉर्मन्स फंगस के कारण होता है, जो कबूतरों की बीट में पाया जाता है।

सिटाकोसिस : इसे ऑर्निथोसिस भी कहा जाता है, यह एक बैक्टीरियल बीमारी है जो क्लैमाइडिया सिटासी बैक्टीरिया के कारण होती है, जो कि कबूतरों में पाई जाती है।‌

हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस : यह एक फेफड़ों की बीमारी है जो कबूतरों के पंखों और बीट से निकलने वाले एलर्जी कारकों के कारण होती है।

वैसे भी कबूतर भारतीय मूल का पक्षी नहीं है, यह अफ्रीका महाद्वीप से भारत में आया और भारत पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया और दूसरे सभी पक्षियों को विलुप्त कर दिया।

जो जैन समुदाय मुंबई में कबूतरों को दाना डालने के लिए वर्षों से आंदोलनरत है उस जैन समुदाय को समझना चाहिए कि कबूतर बढ़ाने से जरूरी है कोयल, गौरैया, मैना, बुलबुल, तोता, कीलहट, टिटिहरी जैसे हजारों भारतीय मूल के पक्षी जो कि शहरों-कस्बों से विलुप्त होते जा रहे हैं उन्हें बचाना ज्यादा जरूरी है। और वह तभी बच सकते हैं जब कबूतरों की संख्या कम की जाए।