Monday, 25 September 2023

सुदामा ने गुरुकुल संदीपनी आश्रम में श्री कृष्णा से छुपकर सारे चने क्यों खा लिए थे ?

भगवान् श्रीकृष्ण  ने अपने मित्र सुदामा के लाये हुए सरे चावल ग्रहण करना प्रारंभ किये और डॉ मुट्ठी ग्रहण कर चुके थे ,  जैसे ही द्वारकाधीश ने तीसरी मुट्ठी चावल उठा कर फाँक लगानी चाही, रुक्मिणी ने जल्दी से उनका हाथ पकड़ कर कहा, "क्या भाभी के लाये इन स्वादिष्ट चावलों के स्वाद का सारा सुख अकेले ही उठाएंगे स्वामी? हमें भी तो ये सुख उठाने का अवसर दीजिये।" 

द्वारकधीश के अधरों पर एक अर्थपूर्ण स्मित उपस्थित हो गयी। उन्होंने चावल वापस उसी पोटली में डाले और उसे उठाकर अपनी पटरानी को दे दिया। 

सुदामा के साथ बातें करते हुए कब कृष्ण उनके पाँव दबाने लगे ये सुदामा को पता ही नही चला।

 सुदामा सो चुके थे किंतु कृष्ण अपनी ही सोंचों में मगन उनके पाँव दबाते हुए बचपन की बातें करते चले जा रहे थे, कि तभी रुक्मिणी ने उनके कंधे पर हाथ रखा। 

कृष्ण ने चौंक कर पहले उन्हे देखा और फिर सुदामा को, फिर उनका आशय समझ कर वहाँ से उठ कर अपने कक्ष में चले आये। 

कृष्ण की ऐसी मगन अवस्था देखकर रुक्मिणी ने पूछा, "स्वामी आज आपका व्यवहार बहुत ही विचित्र प्रतीत हो रहा है। आप, जो इस संसार के बड़े से बड़े सम्राट के द्वारका आने पर उनसे तनिक भी प्रभावित नही होते हैं, वो अपने मित्र के आगमन की सूचना पर इतने भावविव्हल हो गए कि भोजन छोड़कर नंगे पाँव उन्हे लेने के लिए भागते चले गए। आप, जिनको कोई भी दुख, कष्ट या चुनौती कभी रुला नही पाई, यहाँ तक कि जो गोकुल छोड़ते समय मैया यशोदा के अश्रु देखकर भी नही रोये, वे अपने मित्र के जीर्ण शीर्ण, घावों से भरे पाँवों को देखकर इतने भावुक हो गए कि अपने अश्रुओं से ही उनके पाँवों को धो दिया। 

कूटनीति, राजनीति और ज्ञान के शिखर पुरुष आप, अपने मित्र को देखकर इतने मगन हो गए कि बिना कुछ भी विचार किये उन्हे समस्त त्रिलोक की संपदा एवं समृद्धि देने जा रहे थे।" 

कृष्ण ने अपनी उसी आमोदित अवस्था में कहा, "वह मेरे बालपन का मित्र है रुक्मिणी।" 

"परंतु उन्होंने तो बचपन में आपसे छुपाकर वो चने भी खाये थे जो गुरुमाता ने उन्हे आपसे बाँटकर खाने को कहे थे? अब ऐसे मित्र के लिए इतनी भावुकता क्यों?" सत्यभामा ने भी अपनी जिज्ञासा रखी। 

कृष्ण मुस्कुराये, "सुदामा ने तो वह कार्य किया है सत्यभामा, कि समस्त सृष्टि को उसका आभार मानना चाहिए। 

वो चने उसने इसलिए नही खाये थे कि उसे भूख लगी थी बल्कि उसने इसलिए खाये थे क्योंकि वो नही चाहता था कि उसका मित्र कृष्ण दरिद्रता देखे। उसे ज्ञात था कि वे चने आश्रम में चोर छोड़कर गए थे, और उसे यह भी ज्ञात था कि उन चोरों ने वे चने एक ब्राह्मणी के गृह से चुराए थे। उसे यह भी ज्ञात था कि उस ब्राह्मणी ने यह श्राप दिया था कि जो भी उन चनों को खायेगा, वह जीवन पर्यंत दरिद्र ही रहेगा। सुदामा ने वे चने इसलिए मुझसे छुपा कर खाये ताकि मैं सुखी रहूँ।

 वो मुझ को  ईश्वर का कोई अंश समझता था, तो उसने वे चने इसलिए खाये क्योंकि उसे लगा कि यदि ईश्वर ही दरिद्र हो जायेगा तो संपूर्ण सृष्टि ही दरिद्र हो जायेगी। 

सुदामा ने संपूर्ण सृष्टि के कल्याण के लिए स्वय का दरिद्र होना स्वीकार किया।" 

"इतना बड़ा त्याग!" रुक्मिणी के मुख से स्वतः ही निकला।

 "मेरा मित्र ब्राह्मण है रुक्मिणी, और ब्राह्मण ज्ञानी और त्यागी ही होते हैं। उनमें जनकल्याण की भावना कूट कूट कर भरी होती है। इक्का दुक्का अपवादों को यदि छोड़ दिया जाए तो ब्राह्मण ऐसे ही होते हैं। अब तुम ही बताओ ऐसे मित्र के लिए ह्रदय में प्रेम नही तो फिर क्या उत्पन्न होगा प्रिये? 

गोकुल छोड़ते हुए मैं इसलिए नही रोया था क्योंकि यदि मैं रोता तो मेरी मैया तो प्राण ही छोड़ देती। परंतु मेरे मित्र के ऐसे पाँव देखकर, उनमें ऐसे घावों को देखकर मेरा ह्रदय भर आया रुक्मिणी। उसके पाँवों में ऐसे घाव और जीवन में उसकी ऐसी दशा मात्र इसलिए हुई क्योंकि वह अपने इस मित्र का भला चाहता था। 

पता है रुक्मिणी, परिवार को छोड़कर किसी और ने कभी इस कृष्ण का इतना भला नही चाहा। लोग तो मुझसे उनका भला करने की अपेक्षा रखते हैं। 

बस सुदामा जैसे मित्र ही होते हैं जो अपने मित्र के सुख के लिए स्वेच्छा से दरिद्रता एवं कष्ट का आवरण ओढ़ लेते हैं। 

ऐसे मित्र दुर्लभ होते हैं और न जाने किन पुण्यों के फलस्वरूप मिलते हैं। अब ऐसे मित्र को यदि त्रिलोक की समस्त संपदा भी दे दी जाए तो भी कम होगा।" कृष्ण अपने भावुकता से भर्राये हुए स्वर में बोले। 

इधर कक्ष में समस्त रानियों के नेत्र सजल थे और उधर कक्ष के बाहर खड़े सुदामा के नेत्रों से गंगा यमुना बह रही थीं।

 

Saturday, 23 September 2023

भारत में देशद्रोही लॉबी का एक स्तम्भ तीस्ता जावेद सीतलवाड ?

भारत के महान चलचित्र अभिनेता श्री अमिताभ बच्चन का बंगला जलसा  तारा रोड, जुहू, मुंबई पर स्थित  है यह एक विशाल  बंगला है। श्री बच्चन जी  के बंगले के बाद बड़े उद्योगपतियों के 2-3 बंगले हैं l  उसी  रास्ते में तुम्हें एक बड़ा बंगला मिलेगा। बंगले का नाम है "निरांत"। यह बंगला श्री अमिताभ बच्चन के बंगले से 3 गुना बड़ा है। इस बंगले में करीब 3 एकड़ का लॉन है और भव्य है। पॉश इलाके में यह कैसा आलीशान बंगला है, यह देखकर आप हैरान रह जाएंगे। जैसे मुंबई का जुहू है! वह बंगला "निरांत" किसी सुपरस्टार या उद्योगपति का नहीं है। वह बंगला किसी और का नहीं बल्कि... तीस्ता जावेद सीतलवाड़ का है। वह सिर्फ एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। 2004 से 2012 तक उन्हें विदेशों से करोड़ों  डॉलर का दान मिला।

किसलिए? गरीबों का उत्थान करना।

अब एक बात और है... कुछ लोग भारत विरोधी क्यों हैं? उनके पूर्वजों ने बीज बोया था... कुख्यात हंटर कमीशन एक जाँच आयोग था जिसने जलियांवाला बाग नरसंहार का आदेश देने वाले जनरल रेजिनाल्ड डायर को क्लीन चिट दी थी।

इसके सदस्य रहे चिमनलाल हरिलाल सीतलवाड, तिस्ता सीतलवाड के परदादा हैं, तिस्ता जो अब जेल में है

ये चिमनलाल हरिलाल सीतलवाड के बेटे यानी तिस्ता के दादा मोतीलाल चिमनलाल सीतलवाड ही थे, जिन्होंने बाद में इसी जलियांवाला बाग मामले में जनरल डायर को बरी कर दिया था। आजादी के बाद नेहरू ने उसी मोतीलाल चिमनलाल सीतलवाड को अटॉर्नी जनरल नियुक्त किया, जिन्होंने जनरल डायर को बरी कर दिया था।

अंग्रेजों के प्रति नेहरू की ब्रिटिश निष्ठा के कई अमिट अभिलेखों में से एक। बीज की गुणवत्ता की कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती...

जब वही जनरल डायर उसी मामले में मुकदमे का सामना कर रहा था, तो वह दीवान बहादुर कुंज बिहारी थापर ही थे जिन्होंने जनरल डायर की ओर से 1.5 लाख रुपये एकत्र करके और उन्हें कृपाण और पगड़ी के साथ पुरस्कार देकर सम्मानित करके अपनी दृढ़ ब्रिटिश निष्ठा की घोषणा की थी। जी हाँ, वह असल में करण थापर के परदादा थे।

थापर परिवार एक धनी परिवार है जिसने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों को भारी कमीशन के बदले लोगों और सामग्रियों की आपूर्ति करके अपनी संपत्ति बनाई थी।

जब थापर परिवार अपनी निष्ठा की घोषणा करता है, तो आश्चर्य न करें कि सिखों की कृपाण और पगड़ी कहाँ से आई। वास्तव में, यह स्वर्ण मंदिर प्रबंधन ही था जिसने पहल की थी।

यह दो नये अमीर सिंहों सुजान सिंह और शोभा सिंह के तत्वावधान में हुआ। उसका एक कारण है। जब ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित की गई तो ये वे ठेकेदार थे जिनका निर्माण कार्य पर लगभग पूरा नियंत्रण था।

शोभा सिंह का बेटा खुशवंत सिंह एक प्रसिद्ध लेखक विलासी और कट्टर इंदिरा गाँधी भक्त था, जिसने आपातकाल को उचित ठहराने और उसकी निंदा करने वाले लेख लिखे थे। खुशवंत सिंह का बेटा राहुल सिंह, एनडीटीवी पर तिस्ता सीतलवाड और अरुंधति रॉय जैसे लोगों का महिमामंडन करके अभी भी भारतीय विरोध के कबीले के कब्जे को जारी रखे हुए है।

थापर परिवार पर वापस... करण थापर के पिता, प्राण नाथ थापर, भारतीय सेना प्रमुख थे, जिन्होंने 1962 में चीन के साथ युद्ध का नेतृत्व किया था। प्राण नाथ के पूर्ववर्ती, जनरल केएस थिमैया ने मूल रूप से लेफ्टिनेंट जनरल एसपीपी थोराट को अपने उत्तराधिकारी के रूप में प्रस्तावित किया था लेकिन यह नेहरू ही थे जिन्होंने इस प्रस्ताव को विफल कर दिया और प्राण नाथ को अपने दल में शामिल कर लिया। नेहरू की ब्रिटिश निष्ठा का एक और पहलू! इतना ही नहीं, प्राण नाथ के भाई माया दास थापर की बेटी रोमिला थापर थीं, जिन्होंने भारतीय स्कूलों में इतिहास की पाठ्यपुस्तकें लिखीं। वह भी नेहरू का नामांकन था।

स्कूल/विश्वविद्यालय के इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में, आपको यह तथ्य कहीं नहीं मिलेगा कि वह प्राण नाथ थापर ही थे, जिन्होंने 1962 के हारे हुए युद्ध का नेतृत्व किया था। क्या यह आश्चर्य की बात नहीं होगी अगर रोमिला थापर द्वारा तैयार की गई पाठ्यपुस्तक में उनके चाचा का नाम पराजित जनरल के रूप में दिखाई दे!

कुछ हद तक, ये अमीर परिवार ही हैं जिन्होंने ब्रिटिश रिश्वत स्वीकार की और अभी भी कुछ हद तक इतिहास की हमारी समझ को आगे बढ़ा रहे हैं... यही परिवार सारी प्रगति के स्वघोषित थोक विक्रेता हैं। वे ही हैं जो झूठी कहानियाँ लाते हैं और भारतीय पहचान को बढ़ने से रोकते हैं। आजादी के बाद, यह नेहरू और काँग्रेस ही थे जिन्होंने यह सुनिश्चित किया कि इन सभी गद्दारों को महत्वपूर्ण पद देकर ब्रिटिश हितों की रक्षा की जाए।

जब तिस्ता सीतलवाड कारावास में  गईं, तो यह सिर्फ एक धोखेबाज का पतन नहीं है। यह एक बड़े परजीवी पारिस्थितिकी तंत्र का पतन भी है जिसकी जड़ें कई पीढ़ियों से चली आ रही हैं और जो एक सदी से भी अधिक समय से भारतीय लोगों का खून चूस रहा है। ये देशद्रोह को ही फ्रीडम ऑफ़ स्पीच कहते हैं l 

इनके पोषक और पालकों से सावधान  

Wednesday, 13 September 2023

समाजवाद या आतंकवाद ! नोकू कूली (Nokku Kooli) घूरने की मजदूरी , केरल के उद्योग विहीन होने का एक कारण !!

प्रिय पाठकों ,

आप मेरे आलेख पढ़ते है , मैं हृदय से आभारी हूँ l

आज एक अनोखी मजदूरी के बारे में जानकारी लीजिये l

केरल में एक अनोखी मजदूरी वसूल की जाती है ! मजदूरी ना करने की मजदूरी l  जो देनी ही पड़ती है !

यदि आप अपना सामान स्वयं उतारते हैं तो मजदूर दूर से देखते रहेंगे और जब आप अपना काम समाप्त का लेंगे तो ये दर्शक मजदूर आपसे इस बात के पैसे मांगेंगे कि उन्होंने आपको काम करते हुए देखा l

पढ़िए --

Nokku Kooli (घूरने की मजदूरी)…

केरल में आपको अपने घर का सामान भी युनीयन द्वारा ही उतरवाना होता है। टूटने के डर से या अधिक मज़दूरी माँगने के कारण आप नहीं उतरवाना चाहते? कोई बात नहीं, युनीयन वाले बस दूर से आपको सामान उतारते देखेंगे।

जब पूरा सामान आप उतार लेंगे तो ये आएँगे और आप से फिर मज़दूरी माँगेंगे। उतारा नहीं तो क्या हुआ, आपको उतारने देकर आप पर उपकार किया ना? बस दूर से देखा, तोड़ा नहीं, आपका सामान या सिर। उसी की मज़दूरी, जिसे nokku kooli कहते है मलयालम में। 

बंगाल में भी यही होता था।

इसीलिए केरल में कोई उद्योग नहीं है, इसीलिए वहाँ से GST collection हरियाणा का एक तिहाई है, इसीलिए वहाँ की लड़कियाँ ISIS नियंत्रित क्षेत्र में काम करने को विवश है।

Communism/समाजवाद कोई राजनीतिक/आर्थिक विचारधारा नहीं है। केवल गूंडा राज  gangsterism है, व इसीलिए जो देश/प्रदेश इनके नियंत्रण में आ जाता है उसका विनाश हो जाता है l 

चूंकि आपराधिक समाज का, आपराधिक प्रवृत्ति वालों का भी विनाश हो ही जाता है चाहे ऐसा समाज अपनी विचारधारा को राजनीतिक बताये या मज़हबी।

समाचार पत्र और दूरदर्शन समाचार चैनल  भी अपराधी हैं  जिन्होंने बंगाल व केरल में चल रहे इस gangsterism को कभी उजागर नहीं किया।

चीनी फ़ंडिंग से पोषित घमंडीयां गठबंधन आई.एन.डी.आई.ए. भारत के बड़े बड़े उद्गयोपतियों को टार्गेट कर रहा है… जिससे उनकी फ़ैक्ट्री में काम ठप्प पड़े… और चीन के व्यापार और उत्पादन को भारत में बढ़ावा मिले… तो घमंडीया  गठबन्धन की तिजोरियाँ भरें l   

आप किसी भी दल के समर्थक हों लेकिन हींडनबर्ग और जॉर्ज सोरोस जैसे मामलों में आपका एक ही पक्ष होना चाहिए… वो है भारत का पक्ष…

पश्चिम नहीं चाहता कि कल को तीसरी दुनिया का कहा जाने वाला देश आज उनके समकक्ष आकर खड़ा हो जाए… अपने नौकर के बेटे के लिए कार का दरवाजा खोलना पड़े तो दिक्कत तो होगी ही…

अम्बानी, अडानी, हिंदुजा, अग्रवाल, गोदरेज, टाटा आदि आदि… ये सब इस देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैँ… सरकार किसी की भी आये… ये सब हैँ तो ही देश का अर्थतंत्र मजबूत है…

घरघाती हरसंभव कोशिश में हैँ पर हमें बहकावे में नहीं आना है… सत्ता प्राप्ति के लिए पॉजिटिव डायरेक्शन में काम करने की बजाय जयचंद शॉर्टकट अपनाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैँ…

Sunday, 10 September 2023

परमवीर मेजर धनसिंह थापा 1962 भारत चीन युद्ध के अमर नायक

मेजर धन सिंह थापा...

1962 में भारत और चीन के बीच सीमा पर तनाव बढ़ता जा रहा था। चुशूल विमान अड्डे की रक्षा भारत के लिए सामरिक रूप से महत्वपूर्ण थी। इसके लिए उत्तर पैंगोंग में सिरिजैप चौकी पर मेजर धन सिंह थापा के नेतृत्व में 28 जवान तैनात किये गए। मगर चीनी सेना ने उसके प्रत्युत्तर में तीन चौकियाँ बना लीं और लगातार सैनिकों और अस्त्र शस्त्र बढ़ाती रही। धन सिंह थापा ने सैनिकों को किसी भी सम्भावना के लिए तैयार रहने के लिए कहा।

20 अक्टूबर 1962 को उनका अनुमान सही निकला जब चीन ने अत्यधिक तीव्रता से उस चौकी पर हमला बोल दिया। पहले तोपों के मुँह चौकी की तरफ मोड़ कर गोलाबारी की जिसका फायदा उठा कर करीब 600 चीनी सैनिक उस चौकी की तरफ आगे बढ़ते रहे। जब गोलाबारी बंद हुई तब तक वह चौकी काफी क्षतिग्रस्त हो चुकी थी। कई भारतीय जवान घायल अथवा शहीद हो चुके थे। चौकी पर हुई गोलाबारी में संपर्क उपकरण भी नष्ट हो चुके थे जिससे कमान से संपर्क साधना भी असंभव था। धन सिंह थापा का अंतिम सन्देश जो कमान को मिला था वह था, “न पीछे हटूंगा, न समर्पण करूँगा।”

दुश्मन को अपनी तरफ बढ़ते देख धन सिंह थापा ने भारतीय सैनिकों को ललकारा और कहा कि कायरों की तरह जीने से अच्छा है कि वीरों की तरह मौत को गले लगाया जाये। इस युद्घ उद्घोष से सैनिकों में वीरता फूटी और उन्होंने शत्रु के हमले का जवाब देना शुरू किया। कई चीनी सैनिक मारे गए, जिसके उपरान्त अधिक भीषणता से तोपों ने भारत की चौकी पर गोले बरसाने शुरू कर दिए। साथ ही दुश्मन चौकी के और निकट आता रहा। वहाँ से उन्होंने चौकी पर दाहक बमों से हमला कर दिया जिससे बचे हुए भारतीय सैनिक भी चौकी से बाहर निकल आयें। परन्तु भारतीय सैनिकों ने हथगोलों और छोटे हथियारों से अपना प्रतिरोध जारी रखा।

उधर चीनी सेना पूरी तैयारी कर के आयी थी। मशीन गन, बजूका से लैस चीनी सैनिकों का साथ देने Amphibious Crafts भी आ गए थे। पूरी अग्निक्षमता उस एक चौकी पर झोंक दी गयी थी। उधर धन सिंह थापा अपने बचे हुए साथियों का हौंसला बढ़ाते हुए चीनी सैनिकों का काल बने हुए थे। एक छोटी सी भारतीय चौकी बवंडर में जल रहे दीपक की तरह चीनी सेना को चुनौती देती जा रही थी। हतप्रभ हो कर चीनी सेना ने टैंक ले कर अपने सैनिकों के साथ उस चौकी पर चढ़ाई कर दी। इस तीसरे आक्रमण के समय उस चौकी में सिर्फ तीन सैनिक ही जीवित बचे थे। दूर से दिखने पर लग रहा था जैसे चौकी में सिर्फ आग और धुआँ था। परन्तु जब धन सिंह थापा और उनके साथी जवानों के पास कोई हथियार नहीं बचा तब वे अपनी खुखरी ले कर चीनी सैनिकों पर टूट पड़े। कई सैनिकों को मार गिराने के बाद उन तीन सैनिकों पर काबू कर लिया गया और उन्हें बंदी बना लिया गया।

उधर अटकलों के अनुसार यह सोचा गया कि इतने भीषण संघर्ष और अपरिहार्य शत्रु सैनिकों की संख्या के आक्रमण के बाद भारतीय पक्ष में किसी के बचने की सम्भावना नहीं थी। मेजर धन सिंह थापा को मरणोपरांत परमवीर चक्र से अलंकृत किया गया। परन्तु चीनी बंदी शिविर में संघर्षपूर्ण समय बिताने के बाद धन सिंह थापा वापस लौटे जहाँ उनका भव्य स्वागत हुआ। 


Saturday, 9 September 2023

Why Shri Krishna shifted his Capital City From Mathura to Dwarka?

 ये तो सबको पता है कि कंस का ससुर जरासंध था। जब कृष्ण-बलराम ने मिलकर कंस को मार दिया तो जरासंध इन दोनों का शत्रु हो गया।

जरासंध उस समय का एक बहुत शक्तिशाली राजा था, उस के दल  में शिशुपाल,रुक्मी, दाम्भक,शाल्व जैसे अधर्मी राजा थे। मथुरा के यदुवंशी  बहुत वीर थे पर उनकी सेना जरासंध की सेना के मुकाबले बहुत छोटी थी।

जरासंध ने मथुरा पर कई बार आक्रमण किये, कृष्ण बलराम अपने कुछ सहयोगियों के साथ हर बार मथुरा छोडकर निकल जाते और घने जंगलों,दुर्गम खाइयों में जरासन्ध की विशाल सेना को अटका कर चतुराई से हरा देते। इनमे से सबसे भयानक युद्ध गोमांतक पर्वत के आसपास हुआ था जो आज का गोआ है। सोचिये,किधर मथुरा किधर गोआ !!

जरासन्ध की मथुरा से दुश्मनी नही थी। वो इन दोनों के पीछे था, इसलिए बार-बार मथुरा पर चढ़ आता था।

कहा जाता है कि ऐसे 17 आक्रमण हुए।

ज़ाहिर है कि सदा युद्धरत रहना किसी भी देश के विकास को रोक देता है क्योंकि एक युद्ध खत्म होते ही अगले युद्ध की तैयारी शुरू हो जाती थी तो न जनता को न राजा को विकास के लिए समय और अवसर मिलता था।

मथुरा की आम जनता त्रस्त हुई होंगी, नगर की सुरक्षा दीवारें कमज़ोर हुई होंगी।

अंततः जरासंध ने मदद के लिए एक विदेशी म्लेच्छ कालयवन को बुलाया। 

कालयवन से युद्ध करना मुश्किल था क्योंकि वो क्रूर  लुटेरा भी था। उसके सैनिक क्रूर हत्यारे थे जो खुद की रक्षा या धर्म के लिए नही लड़ते थे; हत्या करना रक्तपान करना उनका स्वभाव था । 

कृष्ण बलराम मथुरा में नही मिलते तो कालयवन नगर लूट लेता, स्त्रियों को अपमानित करता, बच्चों को बेच देता  पुस्तकालय-गुरुकुल जला देते। 

कृष्ण की चिंता उससे भी बड़ी रही होगी कि ऐसा लुटेरा सिर्फ मथुरा को लूट कर नही लौटेगा, अपितु शेष आर्यावर्त पर भी उसकी कुदृष्टि पड़ेगी l 

कोई हिंसक पशु जंगल मे है तो ठीक है पर कोई उसको नगर में ले आये तो मूर्ख कहलाता है।

जरासंध ने अपने बदले और अहंकार की तुष्टि के लिए यही किया था।

कालयवन और जरासंध का एक साथ सामना करना मुश्किल था, यादव इनको एक बार पराजित कर भी देते तो ये कुछ समय बाद फिर से हमला करते।

इसलिए कृष्ण ने पहले बलराम,सात्यकि,उद्धव,कृतवर्मा को अपनी योजना बताई। ये सब प्रशिक्षित योद्धा थे तो स्वाभाविक था कि मथुरा छोड़कर द्वारका में बसने की बात को ही कायरता माना होगा।

किन्तु श्री कृष्ण ने समझाया कि युद्ध से भाग नहीं रहे अपितु  युद्ध अपने चुने हुए स्थान और व्यूह के हिसाब से लड़ना भी युद्धकला का ही एक भाग है। 

मथुरा में इन दोनों से लड़ना मूर्खता और आत्महत्या होगी।

इनके मानने के बाद ये प्रस्ताव सुधर्मा सभा मे रखा गया,उधर भी खूब विरोध हुआ। पर कृष्ण ने सबको समझाया कि अपने घर से मोह स्वाभाविक है पर अगर घर मे आग लग जाये तो हम सबसे पहले परिवार के लोगों को बाहर निकालते हैं, फिर आग बुझाने की कोशिश करते हैं।फिर भी न बुझे तो भारी हृदय से घर को जलता हुआ छोड़ कर आगे भविष्य निर्माण में लग जाते हैं।

अंततः सब को  श्री कृष्ण के तर्कों के आगे झुकना पड़ा, इस तरह मथुरा निवासी द्वारकावासी हुए।

कालयवन भगवान् श्री कृष्ण से युद्ध हेतु उनका पीछा करते हुए गुफा में पहुचा दिया गया जहां राजा मान्धाता के पुत्र मुचकुंद , देव दानव युद्ध में देवताओं की सहायता करने और विजय के पश्चात गहन निद्रा का वरदान लेकर सों रहे थे , काल यवन ने युगों से सों रहे  राजा मुचकुंद को जगा दिया और उनकी अगनेया दृष्टी से भस्म हो गया l 

 जरासंध को कृष्ण ने बाद में भीम के हाथों मल्ल युद्ध में मरवाया और शरीर को आधा चीरकर विपरीत दिशाओं में फेंक कर मुक्त करवा दिया l इस प्रकार पाण्डव / राजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ निर्विघ्न संपन्न हो सका l 

कृष्ण का पूरा जीवन ही इस तरह के दुर्धर्ष संघर्षों की गाथा हैl 

बहुत दुःख होता है जब कुछ मूढ़ कथाकार राधा-कृष्ण की मनगढ़ंत कथाएं सुनाकर रासलीला की बातें करते हैं और  योगी राज श्री कृष्ण के सर्वश्रेष्ठ जीवन को वर्णित ही नहीं करते l 

जय श्री कृष्ण !!