ये तो सबको पता है कि कंस का ससुर जरासंध था। जब कृष्ण-बलराम ने मिलकर कंस को मार दिया तो जरासंध इन दोनों का शत्रु हो गया।
जरासंध उस समय का एक बहुत शक्तिशाली राजा था, उस के दल में शिशुपाल,रुक्मी, दाम्भक,शाल्व जैसे अधर्मी राजा थे। मथुरा के यदुवंशी बहुत वीर थे पर उनकी सेना जरासंध की सेना के मुकाबले बहुत छोटी थी।
जरासंध ने मथुरा पर कई बार आक्रमण किये, कृष्ण बलराम अपने कुछ सहयोगियों के साथ हर बार मथुरा छोडकर निकल जाते और घने जंगलों,दुर्गम खाइयों में जरासन्ध की विशाल सेना को अटका कर चतुराई से हरा देते। इनमे से सबसे भयानक युद्ध गोमांतक पर्वत के आसपास हुआ था जो आज का गोआ है। सोचिये,किधर मथुरा किधर गोआ !!
जरासन्ध की मथुरा से दुश्मनी नही थी। वो इन दोनों के पीछे था, इसलिए बार-बार मथुरा पर चढ़ आता था।
कहा जाता है कि ऐसे 17 आक्रमण हुए।
ज़ाहिर है कि सदा युद्धरत रहना किसी भी देश के विकास को रोक देता है क्योंकि एक युद्ध खत्म होते ही अगले युद्ध की तैयारी शुरू हो जाती थी तो न जनता को न राजा को विकास के लिए समय और अवसर मिलता था।
मथुरा की आम जनता त्रस्त हुई होंगी, नगर की सुरक्षा दीवारें कमज़ोर हुई होंगी।
अंततः जरासंध ने मदद के लिए एक विदेशी म्लेच्छ कालयवन को बुलाया।
कालयवन से युद्ध करना मुश्किल था क्योंकि वो क्रूर लुटेरा भी था। उसके सैनिक क्रूर हत्यारे थे जो खुद की रक्षा या धर्म के लिए नही लड़ते थे; हत्या करना रक्तपान करना उनका स्वभाव था ।
कृष्ण बलराम मथुरा में नही मिलते तो कालयवन नगर लूट लेता, स्त्रियों को अपमानित करता, बच्चों को बेच देता पुस्तकालय-गुरुकुल जला देते।
कृष्ण की चिंता उससे भी बड़ी रही होगी कि ऐसा लुटेरा सिर्फ मथुरा को लूट कर नही लौटेगा, अपितु शेष आर्यावर्त पर भी उसकी कुदृष्टि पड़ेगी l
कोई हिंसक पशु जंगल मे है तो ठीक है पर कोई उसको नगर में ले आये तो मूर्ख कहलाता है।
जरासंध ने अपने बदले और अहंकार की तुष्टि के लिए यही किया था।
कालयवन और जरासंध का एक साथ सामना करना मुश्किल था, यादव इनको एक बार पराजित कर भी देते तो ये कुछ समय बाद फिर से हमला करते।
इसलिए कृष्ण ने पहले बलराम,सात्यकि,उद्धव,कृतवर्मा को अपनी योजना बताई। ये सब प्रशिक्षित योद्धा थे तो स्वाभाविक था कि मथुरा छोड़कर द्वारका में बसने की बात को ही कायरता माना होगा।
किन्तु श्री कृष्ण ने समझाया कि युद्ध से भाग नहीं रहे अपितु युद्ध अपने चुने हुए स्थान और व्यूह के हिसाब से लड़ना भी युद्धकला का ही एक भाग है।
मथुरा में इन दोनों से लड़ना मूर्खता और आत्महत्या होगी।
इनके मानने के बाद ये प्रस्ताव सुधर्मा सभा मे रखा गया,उधर भी खूब विरोध हुआ। पर कृष्ण ने सबको समझाया कि अपने घर से मोह स्वाभाविक है पर अगर घर मे आग लग जाये तो हम सबसे पहले परिवार के लोगों को बाहर निकालते हैं, फिर आग बुझाने की कोशिश करते हैं।फिर भी न बुझे तो भारी हृदय से घर को जलता हुआ छोड़ कर आगे भविष्य निर्माण में लग जाते हैं।
अंततः सब को श्री कृष्ण के तर्कों के आगे झुकना पड़ा, इस तरह मथुरा निवासी द्वारकावासी हुए।
कालयवन भगवान् श्री कृष्ण से युद्ध हेतु उनका पीछा करते हुए गुफा में पहुचा दिया गया जहां राजा मान्धाता के पुत्र मुचकुंद , देव दानव युद्ध में देवताओं की सहायता करने और विजय के पश्चात गहन निद्रा का वरदान लेकर सों रहे थे , काल यवन ने युगों से सों रहे राजा मुचकुंद को जगा दिया और उनकी अगनेया दृष्टी से भस्म हो गया l
जरासंध को कृष्ण ने बाद में भीम के हाथों मल्ल युद्ध में मरवाया और शरीर को आधा चीरकर विपरीत दिशाओं में फेंक कर मुक्त करवा दिया l इस प्रकार पाण्डव / राजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ निर्विघ्न संपन्न हो सका l
कृष्ण का पूरा जीवन ही इस तरह के दुर्धर्ष संघर्षों की गाथा हैl
बहुत दुःख होता है जब कुछ मूढ़ कथाकार राधा-कृष्ण की मनगढ़ंत कथाएं सुनाकर रासलीला की बातें करते हैं और योगी राज श्री कृष्ण के सर्वश्रेष्ठ जीवन को वर्णित ही नहीं करते l
जय श्री कृष्ण !!
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