Saturday, 27 December 2025

कोहेनूर (स्मयन्तक मणि) , मयूर सिंहासन (तख्ते-ताउस) के हाल क्या हैं ?

 भारत का तख्ते ताउस अब कुछ इस हाल में टर्की में पड़ा शर्मिंदा है। भारत चाहे जितना अमीर हो जाये मगर आगामी पीढ़ी यह ध्यान रखे कि जब तक हम ईरान से तख्ते ताउस जितनी रकम और दरिया ए नूर नामक हीरा तथा ब्रिटेन से कोहिनूर हीरा नही ले लेते हमारी लड़ाई पूरी नही होगी।

बात 1737 की है जब पेशवा बाजीराव दिल्ली जीत चुके थे हालांकि मुगल बादशाह को हटाने में सफल नही हुए थे पर इससे दुनिया भर में संदेश गया कि मुगल अब कमजोर है और इसी का फायदा उठाया ईरान के बादशाह नादिर शाह ने।

नादिर शाह ने 1739 में भारत पर आक्रमण किया और मुगलो को हराया, मुगल बादशाह मुहम्मद शाह की ओर से अवध का नवाब सादत खान और हैदराबाद का निजाम चिंकूलीज खान लड़े थे। सादत खान नादिरशाह से मिल गया और नादिरशाह को दिल्ली लूटने के लिये आमंत्रित किया।

नादिरशाह ने दिल्ली में प्रवेश किया और मुहम्मद शाह एक कैदी की तरह चल रहा था। नादिरशाह ने खुद को हिंदुस्तान का बादशाह कहना शुरू कर दिया, वह 3 महीने दिल्ली में रुका शुरू में उसने दिल्ली को नही लूटा। नादिरशाह की हरकतों को पेशवा बाजीराव पुणे में समझ रहे थे मगर ये वो दौर था जब मराठो का युद्ध पुर्तगालियों से चल रहा था इसके अलावा छत्रपति शाहू नही चाहते थे कि पेशवा नादिरशाह से जा भिड़े।

पेशवा मुगलो की सहायता करने को आतुर थे उस समय मराठो की शक्ति छत्रपति के पास होती थी। अतः अब मुगलो को स्वयं ही नादिरशाह से निपटना था, नादिरशाह को 3 महीने ही हुए थे कि दिल्ली में किसी ने अफवाह फैला दी कि नादिरशाह मर गया है। अफवाह जैसे ही फैली दिल्लीवासियों ने ईरानी सैनिकों को मारना शुरू कर दिया इससे नादिरशाह भड़क गया और उसने दिल्ली में कत्लेआम मचा दिया।

दिल्ली में खून की नदी बहने लगी, साथ ही नादिरशाह ने शाहजहाँ द्वारा बनवाया तख्ते ताउस (मयूर सिंहासन) लूट लिया और उसमे जड़ा कोहिनूर हीरा भी। कोहिनूर हीरा द्वापर युग की स्मयन्तक मणि था जिसे श्रीकृष्ण ने यादवों को सौंपा था।

कोहिनूर हीरा इतना कीमती था कि यदि वह मुगलो के पास होता तो मुगल फिर से खुद को खड़ा कर सकते थे। यह इतना महंगा था कि दुनिया भर की गरीबी 3 बार मिटा सकता था। इसके साथ ही नादिरशाह दरिया ए नूर नामक अन्य हीरा भी लूट ले गया।

1748 में ईरान में नादिरशाह की बेरहमी से हत्या कर दी गयी और तख्ते ताउस को कई हिस्सों में तोड़ कर अलग अलग काम मे लिया गया। इसके साथ ही कोहिनूर हीरा नादिरशाह के गुलाम अहमदशाह अब्दाली के हाथ लग गया और बाद में महाराज रणजीत सिंह के पास होता हुआ धोखे से इंग्लैंड पहुँच गया। कोहिनूर अब भी ब्रिटिश महारानी के ताज में जड़ा है।

तख्ते ताउस का बैठने वाला हिस्सा अब टर्की के एक सिंहासन में लगा है और बस यही तख्ते ताउस की अंतिम निशानी है। दरिया ए नूर ईरान की रिजर्व बैंक के कब्जे में है। इसीलिये आज जब भी देखता हूं कि ईरान में कोई बम धमाका हो रहे है लोग भूखों मर रहे है एक मानव होकर भी इसका दुख नही होता।

ईरान और ब्रिटेन से दोस्ती आज हमारी मजबूरी है मगर आने वाली पीढ़ी को संदेश है कि आज से 100-200 या 500 वर्षो बाद जब भी मौका मिले ईरान से अपना खोया सम्मान जरूर प्राप्त करो और ब्रिटेन से कोहिनूर। ईरान में कत्लेआम क्यो ना मचाना पड़े मगर उन्हें याद दिलाओ की मुसलमानो के साथ हमारी लड़ाई राष्ट्रीय है अंतरराष्ट्रीय नही की दुनिया की कोई भी ताकत हिन्दू मुस्लिम झगड़ो का फायदा उठा ले।

जिस तरह यहूदी अपने बच्चो को येरुशलम की दीवार के बारे में बताते थे ठीक उसी तरह हर भारतीय लाल किले में हुई इस लूट के बारे में अपने बच्चों को बताए। मुसलमानो से निवेदन है कि वे भी अपने बच्चों को इसके लिये आगाह करे, हमारी शत्रुता इस्लाम या पैगम्बर से नही है बल्कि कट्टरपंथ से है जिस दिन इस्लाम से कट्टरपंथ समाप्त हो जाएगा हमारी कट्टरता भी शून्य हो जाएगी।

"भारत सर्वोपरि" 💪💪

जय श्री राम 🙏🚩

Wednesday, 17 December 2025

क्या लालकिला शाहजहाँ ने बनवाया था ? सफ़ेद झूठ !

 गौर से पढ़िए इस चित्र के नीचे लिखी इस बात को,

यह चित्र ऑक्सफोर्ड संग्रहालय में लगा हुआ है, जिसमें चित्र के नीचे उसके संदर्भ में लिखा हुआ है कि,

शाहजहां 1628 के लालकिले के "दीवाने आम" में विदेशी राजदूत से मिला,

अर्थात 1628 में भी लालकिला मौजूद था लेकिन जवाहर लाल नेहरू के कालखंड में कांग्रेस सरकार पोषित वामपंथी इतिहासकारों ने लिखा है कि,

लालकिला शाहजहां ने 1638 में बनवाया, जबकि तथ्य बताते हैं कि लालकिला पृथ्वीराज चौहान के नाना महाराजा अनंगपाल ने उस मुग़ल बादशाह शाहजहां से कई शताब्दी पहले बनवाया था।

वामियों और कामियों (खान्ग्रेसियों ) ने गढ़ा एक झूठ और पढाया  भी l 

Tuesday, 16 December 2025

चंवर राजवंश (चमार जाति) का इतिहास...

 

चंवर राजवंश (चमार जाति) का इतिहास...

         अलाऊद्दीन खिलजी के शासनकाल से पहले पूरे भारतीय इतिहास में 'चमार' नाम की किसी जाति का उल्लेख नहीं मिलता। आज जिन्हें हम चमार जाति से संबोधित करते हैं और जिनके साथ छुआछूत का व्यवहार करते हैं, दरअसल वह वीर चंवर वंश के महान योद्धा थे।

          भारत के सबसे विश्वसनीय इतिहास लेखकों में से एक विद्वान कर्नल टाड को माना जाता है, जिन्होनें अपनी पुस्तक द हिस्ट्री आफ राजस्थान में चंवर वंश के बारे में विस्तार से लिखा है।

         प्रख्यात लेखक डॅा विजय सोनकर शास्त्री ने भी गहन शोध के बाद इनके स्वर्णिम अतीत को विस्तार से बताने वाली पुस्तक हिन्दू चर्मकार जाति एक स्वर्णिम गौरवशाली राजवंशीय इतिहास" लिखी। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी इस राजवंश का उल्लेख है। डॉ शास्त्री के अनुसार प्राचीनकाल में न तो चमार कोई शब्द था और न ही इस नाम की कोई जाति ही थी

         हमारे  भारत में सभी सुसंगठित पंचायतों से 150 से अधिक चमार समुदाय की उपजातियों की पहचान होती है, इनमे राजवंशीय क्षत्रिय गौत्र मिलते है जिनमे तंवर/तोमर, तूर, पातलीय/पातलान, बशिषट, भदोरिया/भभौरिया, सोलंकी, परमार, पंवार, दहिया, रोहिलला आदि गौत्र समिलित है।

         डॅा विजय सोनकर शास्त्री के अनुसार तुर्क आक्रमणकारियों के काल में चंवर राजवंश का शासन भारत के पश्चिमी भाग में था और इसके प्रतापी राजा चंवरसेन थे। इस क्षत्रिय वंश के राज परिवार का वैवाहिक संबंध बाप्पा रावल वंश के साथ था। राणा सांगा व उनकी पत्नी झाली रानी ने चंवरवंश से संबंध रखने वाले संत रैदासजी को अपना गुरु बनाकर उनको मेवाड़ के राजगुरु की उपाधि दी थी और उनसे चित्तौड़ के किले में रहने की प्रार्थना की थी।

        संत रविदास चित्तौड़ किले में कई महीने रहे थे। उनके महान व्यक्तित्व एवं उपदेशों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें गुरू माना और उनके अनुयायी बने। उसी का परिणाम है आज भी विशेषकर पश्चिम भारत में बड़ी संख्या में रविदासी हैं। राजस्थान में चमार जाति का बर्ताव आज भी लगभग राजपूतों जैसा ही है। औरतें लम्बा घूंघट रखती हैं आदमी ज़्यादातर मूंछे और पगड़ी रखते हैं।

        संत रविदास की प्रसिद्धी इतनी बढ़ने लगी कि इस्लामिक शासन घबड़ा गया। सिकन्दर लोदी ने मुल्ला सदना फकीर को संत रविदास को मुसलमान बनाने के लिए भेजा। वह जानता था कि यदि रविदास इस्लाम स्वीकार लेते हैं तो भारत में बहुत बड़ी संख्या में इस्लाम मतावलंबी हो जायेगे। लेकिन उसकी सोच धरी की धरी रह गयी। स्वयं मुल्ला सदना फकीर शास्त्रार्थ में पराजित हो कोई उत्तर न दे सका और उनकी भक्ति से प्रभावित होकर अपना नाम रामदास रखकर उनका भक्त वैष्णव (हिन्दू) हो गया। दोनों संत मिलकर हिन्दू धर्म के प्रचार में लग गए जिसके फलस्वरूप सिकंदर लोदी आगबबूला हो उठा एवं उसने संत रैदास को कैद कर लिया और इनके अनुयायियों को चमार यानी अछूत चंडाल घोषित कर दिया। उनसे कारावास में खाल खिचवाने, खाल चमड़ा पीटने, जुती बनाने इत्यादि काम जबरदस्ती कराया गया उन्हें मुसलमान बनाने के लिए बहुत शारीरिक कष्ट दिए। लेकिन संत रैदास ने कहा:-

        वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान,
फिर मै क्यों छोडू इसे, पढ़ लूं  झूठ कुरान.
वेद धर्म छोडू नहीं, कोसिस करो हज़ार,
तिल-तिल काटो चाहि, गोदो अंग कटार

(रैदास रामायण)

     संत रैदास पर हो रहे अत्याचारों के प्रतिउत्तर में चंवर वंश के क्षत्रियों ने दिल्ली को घेर लिया। इससे भयभीत हो सिकन्दर लोदी को संत रैदास को छोड़ना पड़ा था। 

  संत रैदास का यह दोहा देखिए:-

      बादशाह ने वचन उचारा | मत प्यारा इसलाम हमारा ||
खंडन करै उसे रविदासा | उसे करौ प्राण कौ नाशा ||
जब तक राम नाम रट लावे | दाना पानी यह नहीं पावे ||
जब इसलाम धर्म स्वीकारे | मुख से कलमा आप उचारै ||
पढे नमाज जभी चितलाई | दाना पानी तब यह पाई ||

      समस्या तो यह है कि आपने और हमने संत रविदास के दोहों को ही नहीं पढ़ा, जिसमें उस समय के समाज का चित्रण है जो बादशाह सिकंदर लोदी के अत्याचार, इस्लाम में जबरदस्ती धर्मांतरण और इसका विरोध करने वाले हिंदू ब्राहमणों व क्षत्रियों को निम्न कर्म में धकेलने की ओर संकेत करता है।

        चंवर वंश के वीर क्षत्रिय जिन्हें सिकंदर लोदी ने 'चमार' बनाया और हमारे आपके हिंदू पुरखों ने उन्हें अछूत बना कर इस्लामी बर्बरता का हाथ मजबूत किया। इस धर्म वीर महान समाज ने पददलित और अपमानित होना स्वीकार किया, लेकिन विधर्मी होना स्वीकार नहीं किया आज भी यह समाज हिन्दू धर्म का आधार बनकर खड़ा है। कश्मीर के दलित समाज भी इस वीर गाथा का उदाहरण हैं जिन्हेई मुसलमानों ने दबा कर रखा लेकिन वे धर्मान्तरित नहीं हुए l 

  #साभार

 

Saturday, 13 December 2025

Numbers which can be divided by all 1-10. Find by Shri Ramanujan

 #अद्भूत 🙏

गणित में कोई भी संख्या 1 से 10 तक के सभी अंकों से नहीं कट सकती, लेकिन इस विचित्र संख्या को देखिये ..!

दरअसल, सदियों तक यह माना जाता रहा था कि ऐसी कोई भी संख्या नहीं है जिसे 1 से 10 तक के सभी अंको से विभाजित किया जा सके। लेकिन रामानुजन ने इन अंकों के साथ माथापच्ची करके इस मिथ को भी तोड़ दिया था। उन्होंने एक ऐसी संख्या खोजी थी जिसे 1 से 10 तक के सभी अंकों से विभाजित किया जा सकता है। यानी भाग दिया जा सकता है। यह संख्या है 2520,

संख्या 2520 अन्य संख्याओं की तरह वास्तव में एक सामान्य संख्या नही है, यह वो संख्या है जिसने विश्व के गणितज्ञों को अभी भी आश्चर्य में किया हुआ है।

यह विचित्र संख्या 1 से 10 तक प्रत्येक अंक से भाज्य है। ऐसी संख्या जिसे इकाई तक के किसी भी अंक से भाग देने के उपरांत शेष शून्य रहे, बहुत ही असम्भव/ दुर्लभ है - ऐसा प्रतीत होता है।

अब निम्न सत्य को देखें :

2520 ÷ 1 = 2520

2520 ÷ 2 = 1260

2520 ÷ 3 = 840

2520 ÷ 4 = 630

2520 ÷ 5 = 504

2520 ÷ 6 = 420

2520 ÷ 7 = 360

2520 ÷ 8 = 315

2520 ÷ 9 = 280

2520 ÷ 10 = 252

महान गणितज्ञ अभी भी आश्चर्यचकित है : 2520 वास्तव में एक गुणनफल है《7 x 30 x 12》का। उन्हे और भी आश्चर्य हुआ जब प्रमुख गणितज्ञ द्वारा यह संज्ञान में लाया गया कि संख्या 2520 हिन्दू संवत्सर के अनुसार एकमात्र यही संख्या है जो वास्तव में उचित बैठ रही है, जो इस गुणनफल से प्राप्त हैः

सप्ताह के दिन (7) x माह के दिन (30) x वर्ष के माह (12) = 2520

यही है भारतीय गणना की श्रेष्ठता

Thursday, 11 December 2025

अयोध्या में धर्मध्वजा स्थापना करने वाले - भारतीय सेना की 316 EME सैन्य यूनिट के वीर

जय हिन्द  

अयोध्या में धर्मध्वजा स्थापना का कार्यक्रम निर्बाध रूप से संपन्न हो गया ।

पर आपको जाकर बहुत ही खुशी होगी कि इस पुरे कार्यक्रम का कार्यभार भारतीय सेना के 316 EME सैन्य यूनिट पर था।

316 यूनिट्स भारतीय सेना के उन महत्वपूर्ण यूनिट्स में से है जो भारत के दुर्गम और ऊँचाई वाले स्थलों पर भी भारी संरचनाओं के high precision mechanical कार्यों में महारत रखती हैं।

अयोध्या मंदिर का ध्वजदंड साधारण नहीं था। यह लगभग सैकड़ों किलो वजन का है, जिसे मिलीमीटर-लेवल बैलेंसिंग की जरूरत होती है।

ऐसा काम वही यूनिट करती है जिसे सेना में flag mast installation specialists माना जाता है।

बद्रीनाथ, केदारनाथ से लेकर वैष्णों देवी के ऊंचाई पर भारतीय सेना की यह यूनिट वहां के भारी भरकम धर्मदंड और धर्मध्वजा बहुत कुशलता पुर्वक लहराने का काम करती रही है।

अयोध्या जैसे राष्ट्रीय भावनाओं के केंद्र स्थल पर सबसे भरोसेमंद तकनीकी सैन्य यूनिट भेजना एक सम्मान भी है और जिम्मेदारी भी, जिसे बहुत ही कुशलता पूर्वक सेना ने पूरा किया🙏🙏🙏🙏