चंवर राजवंश (चमार जाति) का इतिहास...
अलाऊद्दीन खिलजी के शासनकाल से पहले पूरे भारतीय इतिहास में
'चमार' नाम की किसी जाति का उल्लेख नहीं मिलता। आज जिन्हें हम चमार जाति से संबोधित
करते हैं और जिनके साथ छुआछूत का व्यवहार करते हैं, दरअसल वह वीर चंवर वंश के महान
योद्धा थे।
भारत के सबसे विश्वसनीय इतिहास लेखकों में से एक विद्वान
कर्नल टाड को माना जाता है, जिन्होनें अपनी पुस्तक द हिस्ट्री आफ राजस्थान में चंवर वंश
के बारे में विस्तार से लिखा है।
प्रख्यात लेखक डॅा विजय सोनकर शास्त्री ने भी गहन शोध के
बाद इनके स्वर्णिम अतीत को विस्तार से बताने वाली पुस्तक हिन्दू चर्मकार जाति एक
स्वर्णिम गौरवशाली राजवंशीय इतिहास" लिखी। महाभारत के अनुशासन पर्व में भी इस
राजवंश का उल्लेख है। डॉ शास्त्री के अनुसार प्राचीनकाल में न तो चमार कोई शब्द था
और न ही इस नाम की कोई जाति ही थी।
हमारे भारत में सभी सुसंगठित पंचायतों से 150 से अधिक चमार समुदाय की उपजातियों की पहचान होती है, इनमे राजवंशीय क्षत्रिय गौत्र मिलते है जिनमे तंवर/तोमर, तूर, पातलीय/पातलान, बशिषट, भदोरिया/भभौरिया, सोलंकी, परमार, पंवार, दहिया, रोहिलला आदि गौत्र समिलित है।
डॅा विजय सोनकर शास्त्री के अनुसार तुर्क आक्रमणकारियों के
काल में चंवर राजवंश का शासन भारत के पश्चिमी भाग में था और इसके प्रतापी राजा
चंवरसेन थे। इस क्षत्रिय वंश के राज परिवार का वैवाहिक संबंध बाप्पा रावल वंश के
साथ था। राणा सांगा व उनकी पत्नी झाली रानी ने चंवरवंश से संबंध रखने वाले संत
रैदासजी को अपना गुरु बनाकर उनको मेवाड़ के राजगुरु की उपाधि दी थी और उनसे
चित्तौड़ के किले में रहने की प्रार्थना की थी।
संत रविदास चित्तौड़ किले में कई महीने रहे थे। उनके महान
व्यक्तित्व एवं उपदेशों से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें गुरू
माना और उनके अनुयायी बने। उसी का परिणाम है आज भी विशेषकर पश्चिम भारत में बड़ी
संख्या में रविदासी हैं। राजस्थान में चमार जाति का बर्ताव आज भी लगभग राजपूतों
जैसा ही है। औरतें लम्बा घूंघट रखती हैं आदमी ज़्यादातर मूंछे और पगड़ी रखते हैं।
संत रविदास की प्रसिद्धी इतनी बढ़ने लगी कि इस्लामिक शासन घबड़ा गया। सिकन्दर लोदी ने मुल्ला सदना फकीर को संत रविदास को मुसलमान बनाने के लिए भेजा। वह जानता था कि यदि रविदास इस्लाम स्वीकार लेते हैं तो भारत में बहुत बड़ी संख्या में इस्लाम मतावलंबी हो जायेगे। लेकिन उसकी सोच धरी की धरी रह गयी। स्वयं मुल्ला सदना फकीर शास्त्रार्थ में पराजित हो कोई उत्तर न दे सका और उनकी भक्ति से प्रभावित होकर अपना नाम रामदास रखकर उनका भक्त वैष्णव (हिन्दू) हो गया। दोनों संत मिलकर हिन्दू धर्म के प्रचार में लग गए जिसके फलस्वरूप सिकंदर लोदी आगबबूला हो उठा एवं उसने संत रैदास को कैद कर लिया और इनके अनुयायियों को चमार यानी अछूत चंडाल घोषित कर दिया। उनसे कारावास में खाल खिचवाने, खाल चमड़ा पीटने, जुती बनाने इत्यादि काम जबरदस्ती कराया गया उन्हें मुसलमान बनाने के लिए बहुत शारीरिक कष्ट दिए। लेकिन संत रैदास ने कहा:-
वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान,
फिर मै क्यों
छोडू इसे, पढ़ लूं झूठ कुरान.
वेद धर्म छोडू
नहीं, कोसिस करो हज़ार,
तिल-तिल काटो
चाहि, गोदो अंग कटार
(रैदास रामायण)
संत रैदास पर हो रहे अत्याचारों के प्रतिउत्तर में चंवर वंश के क्षत्रियों ने दिल्ली को घेर लिया। इससे भयभीत हो सिकन्दर लोदी को संत रैदास को छोड़ना पड़ा था।
संत रैदास का यह दोहा देखिए:-
बादशाह ने वचन
उचारा | मत प्यारा इसलाम हमारा ||
खंडन करै उसे
रविदासा | उसे करौ प्राण कौ नाशा ||
जब तक राम नाम
रट लावे | दाना पानी यह नहीं पावे ||
जब इसलाम धर्म
स्वीकारे | मुख से कलमा आप उचारै ||
पढे नमाज जभी
चितलाई | दाना पानी तब यह पाई ||
समस्या तो यह
है कि आपने और हमने संत रविदास के दोहों को ही नहीं पढ़ा, जिसमें उस समय के समाज का
चित्रण है जो बादशाह सिकंदर लोदी के अत्याचार, इस्लाम में जबरदस्ती
धर्मांतरण और इसका विरोध करने वाले हिंदू ब्राहमणों व क्षत्रियों को निम्न कर्म
में धकेलने की ओर संकेत करता है।
चंवर वंश के
वीर क्षत्रिय जिन्हें सिकंदर लोदी ने 'चमार' बनाया और हमारे आपके हिंदू पुरखों ने उन्हें
अछूत बना कर इस्लामी बर्बरता का हाथ मजबूत किया। इस धर्म वीर महान समाज ने पददलित और अपमानित
होना स्वीकार किया, लेकिन विधर्मी होना स्वीकार नहीं किया आज भी यह समाज हिन्दू
धर्म का आधार बनकर खड़ा है। कश्मीर के दलित समाज भी इस वीर गाथा का उदाहरण हैं जिन्हेई मुसलमानों ने दबा कर रखा लेकिन वे धर्मान्तरित नहीं हुए l
#साभार
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