कुंभ का सामान्य अर्थ है मटका।
किन्तु गहन अर्थ है ' वह स्थान या पात्र जहा कुछ एकत्रित , सुरक्षित और संरक्षित रहे' .
कुम्भ का नाम भारत के चार स्थानों हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक में देवताओं की पवित्र सभा को दिया जाता है। वास्तव में ये विद्वानों , वैज्ञानिकों , विशेषज्ञों , शोधकर्ताओं , अन्वेषकों,और शोधार्थियों के साथ ही जिज्ञासुओं ,अनुयायियों, दर्शकों , मूल्याङ्कन कर्ताओं , की सभा एवं एकत्रीकरण भी था और अभी भी है। आजकल शिक्षा संस्थानों, विश्वविद्यालयों एवं शाषकीय , अशाषकीय व निजी संस्थाओं प्रकाशकों द्वारा भी विविध विषयो की अंतर्राष्ट्रीय , राष्ट्रीय, वैश्विक, शोध संगोष्ठी ( कांफ्रेंस Conference) आयोजित की जाती हैं। इन सभाओं के साथ ही प्रायोजक अपना व्यापर करते है, और अन्य वपर भी फलता फूलता है। साड़ी गतिविधियां सृष्टि को चालयमान रखने हेतु एवं आर्थिक चक्र (Economy) को भी चालयमान रखने में सहायक होती रही हैं और सदियों से अर्थ प्राप्ति एक प्रमुख उद्देश्य रहा है। हमारे यहाँ भारत में धनोपार्जन, व्यापार का कर्म सदैव सम्मानित रहे किन्तु अन्य कर्मों को भी समान सम्मान मिलता रहा। धर्म अर्थ काम मोक्ष चरों पुरुषार्थ जीवन, सम्माज, और राष्ट्र रूपी रथ के चार चक्र हैं। चरों में संतुलन, सामंजस्य, समता एवं समान वितरण, राजा, गुरु/आचार्य , माता पिता, व्यवस्था पालक, अधिकारी, मंत्री का नैतिक कर्त्तव्य था और है. उन्हे इस कार्य के लिये वेतन एवं पुरस्कार तथा श्रेष्ठ प्रशिक्षण भी दिया जाता था।
अस्तु.....
हमारे देश / भारत में हज़ारों वर्षों से ऐसी संगोष्ठियाँ होती रहीं। विश्व भर के प्रतिनिधि विद्वान , जिज्ञासु इन संगोष्ठियों में आकर अपने शोध, महा शोध, आविष्कार, प्रस्तुत करते, शास्त्रार्थ होता और इस प्रकार नई बातें और ज्ञान का प्रचार प्रसार होता था।
कुम्भ चार वर्षांतर में आयोजित होते थे और राज्यों, जनपदों, विश्वविद्यालयों में ये सम्मलेन वार्षिक,अर्धवार्षिक अथवा समसामयिक होते रहते थे। जैसा आज भी होता है तब भी होता रहा कि इन्ही आयोजनों में संस्थाएं , व्यापारी, उद्योगपति, कर्मकार, अपने नएअनुबंध करते , नए कर्मचारी सहयोगी, अधिकारी चुनते और व्यक्ति भी उन्हें चुनते थे। इन्हीं आयोजनों में नए रिश्ते भी बनते , स्वयंवर भी होते थे , अर्थात व्यापार और व्यवहार , धर्म और संस्कृति का विकास, विस्तार , संवर्धन भी होता था। संगम साहित्य में भी इन सबका संक्षिप्त सांकेतिक उल्लेख किया गया है।
कुम्भ की पौराणिक (नित नूतन) कथा इस प्रकार है कि समुद्र मंथन का आयोजन किया गया जिसमें संपूर्ण सृष्टि से विद्वान्, विशेषज्ञ, देवता पधारे। दानव और मानव भी एकत्र हुए। देवताओं और मानवों के गुरु बृहस्पति और दानवों के गुरु शुक्राचार्य। ब्रह्मा जी ज्ञान के पितामह जनक , विष्णु, संरक्षक और शिव आदिदेव अधिष्ठाता चुने गए। ।
इस समुद्र मंथन में अनेको आविष्कार प्रगट हुए। इसका प्रतीकात्मक अर्थ भी है। ज्ञान का शोध करने वाले शोधकर्ताओं के ज्ञान और संयोजन का मंथन।
उस मंथन से विभिन्न वस्तुएं निकलीं, नए आविष्कार हुए। पुण्य गौ (गाय KAMDHENU) (गौ का अर्थ ज्ञान भी है), वायुयान , रथ , हाथी, घोड़ा, रत्न ,वैदूर्य मणि (कोहेनूर), धातुओं को सोने में परिवर्तित करने के लिए पारस पत्थर, कमल, अमृत, विष, दिव्य औषधियाँ। तार्किक अर्थों में ये थे नए अविष्कार, फॉर्मूले , थीसिस, सूत्र और पेटेंट कॉपीराइट थे।
यहीं पर सब कुछ तो योग्यता के आधार पर वितरित हो गया किन्तु अमृत जो की मनुष्य को अमर बना देता उसका अधिकार किसके पास हो यह विवाद का विषय बना।
विष्णु ने इस अमृत कुम्भ को लेकर प्रमुख चार स्थानों पर डाल दिया. हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नाशिक। इसके अतिरिक्त देश के अन्य स्थानों पर भी अमृत के बूंदे गिरी। पुष्कर, एवं अन्य सरोवर पर्वत शिखर और समुद्र तटों पर जहाँ तीर्थ स्थान हैं।
अब आप विचार कर देखें इन स्थानों पर आज भी विद्वान् एकत्र होते हैं और वर्तमान में विश्व भर में ज्ञान की चर्चा शोध सम्मलेन , कुम्भ होते रहते हैं। सभी प्रतिभागी कुछ फल, प्रतिफल, पुरस्कार एवं नव ऊर्जा प्राप्त करते हैं।
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पढ़ने के लिये धन्यवाद।
जय भारत।
डॉ विनोद मिश्र, PhD, एम् कॉम , एम् ए (अर्थ), एम् टी ए , एम् एड , एम् बी ए , एम् ए (हिंदी) एम् ए (अंग्रेजी), एम् ए (संस्कृत)
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